जगत गुरु श्रीमन्त शंकरदेव का सृष्टिसमूह अर्थात रचनाएः
श्रीमन्त शंकरदेव एक सौ उन्निस वर्ष उम्र तक जीवित थे। एस सुदीर्घ जीवन काल में उन्होने एक शरण हरि नाम धर्म प्रचार के लिए कृष्ण भक्ति केन्द्रिक धर्मशास्त्रों, नाट¬ साहित्य, ध्रुपदी गीति साहित्य आदि रचना किया और इसी तरह भारतीय संस्कृति को एक संस्कारित रुप दिया था। उन्होने मौलिकता के सहित एक सांस्कृतिक धारा का सृष्टि किया और इसी कारण शंकरदेव ने सृष्टि किया हुआ गीत, नृत्य, वाद्य, नात्य आदि सृष्टि समूह को एकत्रित रुप में शंकरदेव संस्कृति या शंकरी-संस्कृति का नाम से जाना जाता हैं।
श्रीमन्त शंकरदेव ने प्राचीन असमीया, ब्राजभाषा और संस्कृत यह तीनों भाषा में ग्रन्थ समूह रचना किए थे –
(ॠ) प्राचीन असमीया भाषा में ः
1) अनुवादमूलक (पदानुवाद) –
(ठ्ठ) श्रीमद्भागवत् शास्त्र का प्रथम स्कन्ध, द्वितीय स्कन्ध, तृतीय स्कन्ध का अनादि पातन, षष्ट स्कन्ध का अजामिल उपाखान, अष्टम स्कन्ध का अमृत मंथन और बलिचलन, दशम स्कन्ध, एकादश स्कन्ध और द्वादश स्कन्ध।
(ड) उत्तराकान्ड रामायण।
2) आख्यान मूलक काव्य-ग्रन्थ –
हरिश्चन्द्र उपाख्यान, रुक्मिनी हरण, कुरुक्षेत्र।
3) तत्व मूलक दार्शनीक काव्य-शाश्त्र-
भक्ति प्रदीप।
4) भक्तिमूलक प्रवन्ध गीति साहित्य-शास्त्र-
कीर्तन घोषा।
5) स्तति गीति काव्य-शास्त्र-
गुणमाला।
(ए) ब्राज भाषा (ब्राजवुलि या ब्राजावली) में –
1) अंकीया नाट¬ (नाटक) –
ठ्ठ) कालिय दमन, ड) केलि गोपाल, ड़) पत्नी-प्रसाद, ड्ड) पारिजात हरण,
ड्ढ) रुक्मिणी हरण और ढ) श्रीराम विजय
2) फ्रारगीत (धूपदी गीत) –
सर्वमूठ पैतीस (35) फ्रारगीत रचना किया था। यह फ्रारगीत समूह ध्रुपदी गीत (क्थ्ठ्ठद्मद्मत्ड़ठ्ठथ् द्मदृदढ़) के अन्तर्गत हैं। प्रत्येक फ्रारगीत के लिए श्रीमन्त शंकरदेव जी ने समय के अनुसार अलग अलग राग सृष्टि किए थे।
3) अंकीया नाटक के गीत (अंकीया गीत) –
शंकरदेव ने एक सौ चोवाल्लिस (144) गीत उनके छः अंकीया नाटक के लिए लिखे थे और प्रत्येक गीत के लिए अलग अलग राग था।
4) भटिमा –
उन्हने तीन प्रकार के भटिमा रचना किए थे। यथा – देव-भटिमा, नाट-भटिमा और राज-भटिमा।
ठ्ठ) दोव-भटिमा –
तीन देव भटिमाए रचना किए थे। उस में से दो ब्राजभाषा में और एक संस्कृत भाषा में। संस्कृत भाषा में रचित इस देव भटिमा को उन्होने त्रोटक छन्द में रचना किया था और इसलिए असमीया भाषा में इस को तोटय नाम से जाना जाता हैं।
