ड) नाट-भटिमा –
तीन प्रकार के हैं –
(त्) आद्य भटिमा – अंकीया नाट के नान्दी (त्दध्दृड़ठ्ठद्यत्दृद) के पश्चात ही सुत्रधार जय जय कृष्ण या राम कह कर परफ्राहृ (परम ब्राहृ) का गूणानुकीत्र्तन करता हैं। संस्कृत नाटक में सुत्रधार नामक चरित्र नही होते। अंकीया नाटक में सुत्रधार सृष्टि शंकरदेव का एक मौलिक अवदान माना जाता हैं। सुत्रधार है नाटक और दर्शक के बीच एक संयोगकारी।
त्त्) मध्य भटिमा – इसका स्थान नाटक के मध्यभाग में होता हैं।
त्त्त्) अन्त भटिमा – नाटक का अन्तिम में यह गाया जाता है और इस को मुक्ति मंगल भटिमा के नाम से जाना जाता हैं।
ड़) राज-भटिमा –
शंकरदेव ने कोचबेहार के नरेश नरनारायण को सम्बोधन करके दो राज भटिमा रचना किए थे और राजसभा में आवृत्ति करके शुनाया था।
क्) संस्कृत भाषा में रचना किया था –
त्) भक्ति रत्नाकर शास्त्र।
त्त्) संस्कृत देव भटिमा (त्रोटक या तोटय)।
जगत गुरु श्रीमन्त शंकरदेव द्वारा स्थापित, प्रवर्तित और प्रचारित एक शरण हरि नाम धर्म का मौलिक लक्षण (चरित्र) समूह –
क) जगत सृष्टि के समय में भगवन्त अर्थान परब्राहृ कृष्ण ने नारायण रुप लेकर हरिनाम धर्म का सृष्टि किया। भगवन्त नारायण के नाभि कमल से ब्राहृाजी का जन्म हुआ था और बहृाजी के भ्रूवमध्य से रुद्र (शिवजी) का ज्नम हुआ था। बहृाजी के जीवन काल का आधा उम्र पार करने के पश्चात नारायण ने बहृाजी को चतुश्र्खोकी भागवत शास्त्र प्रदान किया था और पृथ्वी में भागवत ज्ञान प्रचार करने के लिए उपदेश दिया था। उसके फ्रााद ब्राहृाजी ने उनके मानस पुत्र नारद जी को भागवत ज्ञान दिया। अन्य में नारद जी का उपदेश लेकर महामुनि व्यास ने द्वादश स्कन्ध महाभागवत पुराण रचना किया था। व्यास जी ने द्वादश स्कन्ध महाभागवत पुराण उनके पुत्र शुकमुणि को प्रदान किया और शुकमुणि ने अठाइस हजार ऋषि समाज के उपस्थिति में गंगा नदी के निकट परीक्षित राजाको भागवत का ज्ञान दिया था। ये समय था द्वापर और कलियुग के संयोग काल का।
त्रेतायुग में पुरुषोत्तम श्रीराम का लीला महिमा प्रकाश करने के लिए शिव जी और नारद जी ने भी राम-नाम का अपार महिमा के सम्फ्रान्ध नें गुणानुकीर्तन किए थे।
द्वापर युग में कृष्ण महिमा के सम्बन्ध में शिवजी और नारद जी ने विश्लेषण किए थे और कृष्ण-नाम ही सर्वसिद्धिदाता है कह कर घोषणा किया। द्वापर युग में ही गीता शास्त्रके जरिए श्रीकृष्ण ने मानव जाति को एक शरण तत्व प्रदान किया। (ख) कलियुग में (अर्थात वर्तमान युग में) श्रीमन्त शंकरदेव ही हैं अद्वितीय महापुरुष जिन्होने सुपरिकल्पित रुप से, बहुमुखी सृष्टि के जरिए और व्यापक रूप में एक शरण हरि-नाम धर्म का स्थापना, प्रवर्तन और प्रचार किया था। अतःएव बर्तमान युग में श्रीमन्त शंकरदेव एक शरण हरिनाम धर्म के गुरु हैं।
(ग) एक शरण हरि नाम धर्म चार स्तम्भ पर प्रतिष्ठित हैं – यथा ज्ञान, विज्ञान,तदंग और रहस्य। श्रीमन्त शंकरदेव के शिष्य माधवदेव, दामोदरदेव, हरिदेव, अनन्त कन्दलि आदि सब ने दृश्यमान और अदृश्यमान के ज्ञान दाता श्रीमन्त शंकरदेव के शाश्त्र सम्मत रुप से ही गुरु मान लिया। शंकरदेव गुरुजन के समय से ही गुरु (श्रीमन्त शंकरदेव), देव (भगवन्त कृष्ण), नाम (कृष्ण-नाम), भक्त (मानव समाज) यह चार तत्वों समाज में प्रचलित हैं। सर्वज्ञ भगवन्त कृष्ण ही हैं विज्ञान, कृष्ण-नाम है तदंग और रहस्य भक्ति प्रकाश करने वाला है मानव जाति। अतःएव गुरु, देव, नाम और भक्त यह चार स्तम्भों पर ही एक शरण हरि नाम धर्म स्थापित हैं।
