(घ) श्रीमन्त शंकरदेव द्वारा स्थापित, प्रवर्तित धर्म है एक शरण हरि नाम धर्म, मार्ग है कृष्ण भक्ति और कृष्ण-नाम श्रवण कीर्तन ही हैं एकमात्र माध्यम या उपाय। गुरु श्रीमन्त शंकरदेव ने घोषणा किया कि श्रवण-कीर्तन ही सर्वोत्तम भक्ति मार्ग हैं। उन्होने कीर्तन घोषा शास्त्र में कहा – यद्यपि भकति नवविध माधवर। श्रवण कीर्तन ताते महा श्रेष्टतर।।
(ङ) श्रीमन्त शंकरदेव ने आगम शास्त्रों का सिद्धान्त समूह यथा मूर्ति-पूजन, बलि-विधान आदि कर्मकाण्ड को निषेध किया। अन्य देव-देवीओं का उपासना निषेध किया।
(च) कृष्णस्तु भगवान स्वयम् – परब्राहृ, परमात्मा कृष्ण ने सत्य युग में अष्ट कला युक्त नररुपी नारायण, त्रेता युग में बारह कलायुक्त नररुपी श्रीराम और द्वापर युग में सोल्लह कलायुक्त (पुर्ण कलायुक्त) नररुपी श्रीकृष्ण के रुप में पृथ्वी में अवतार ग्रहण किए थे। इसीलिए श्रीकृष्ण को परमात्मा भगवन्त का नररुप कहकर समस्त शास्त्रों और बहृा जी, शिव जी आदि समस्त देव-देवीओं ने भी मान लिया।
छ) विश्व ब्राहृाण्ड का सृष्टि-पालन-संहार का मूल कारण हैं निराकार-निरंजन, सत्-चित्-आनन्दमय परबहृ परमात्मा कृष्ण।
(ज) श्रीमन्त शंकरदेव थे अद्वैतवादी। उनके सिद्धान्त के अनुसार परमात्मा कृष्ण हैं सर्वशक्तिमान, सर्वव्याप्त और सर्वज्ञ। परमात्मा कृष्ण समस्त जीव में अर्थात मनुष्य, देव-देवी और सभी जीव में आत्माराम रुप से विद्यमान हैं। अर्थात समस्त जीवात्मा लीन हो जाते हैं परमात्मा में। इसीलिए श्रीमन्त शंकरदेवजी ने यह महत् शक्ति को विकृत नहों करने के लिए उपदेश दिया हैं और इसी परमात्मा को मूर्ति के रुप में पूजन करने के लिए निषेध किया। एकमात्र निराकार परबहृ कृष्ण का लीला महिमा श्रवण-कीर्तन करने के लिए ही सिद्धान्त दिया। इसीलिए नाटक के जरिए नररुपी भगवन्त कृष्ण के नररुपी लीला समूह दिखाया जाता है और भगवन्त का गुणानु कीर्तन किया जाता हैं।
(झ) श्रीमन्त शंकरदेव ने सिद्धान्त दिया हैं कि परमात्मा या भगवन्त ईश्वर एक है और वह हैं निराकार सच्चिदानन्द कृष्ण। परब्राहृ विभव रुप में पृथ्वी में अवतार ग्रहण करते हैं। पूर्णब्राहृ, मानव और अन्य जीव यथा मत्स्य, कुर्म, नरसिंह, फ्राामन, परशुराम, हिलराम, फ्राराह, श्रीराम, बुद्ध, किल्क आदि जौबिस अवतार ग्रहण करते हीं। कल्कि अवतार अंतिम अवतार हैं और इसके बाद सत्ययुग रचना होगा। ईश्वर ने अवतार लेते हैं सन्त को पालन और पाखण्ड दुराचार को दमन करने के लिए।
(ञ) कलियुग में अर्थात वर्तमान युग मे पालनीय शास्त्रसम्मत युग-धर्म हैं एक शरण हरि नाम धर्म। वेद-वेदान्त, भागवत पुराण, बृहदनारदीय पूराण, गरुड़ पुराण आदि समस्त निगम शास्त्रो में युग धर्म सम्बन्ध में सिद्धान्त दिया हैं इस प्रकार से-
कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः।
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्ः।।
