(ट) श्रीमन्त शंकरदेव ने एक शरण हरि नाम धर्म तथा शंकरदेव संस्कृति चर्चा का केन्द्र स्थान के रूप में नामघर सृष्टि किया। धर्मीय बिच्छिन्नतावाद ने ग्रासित किया हुआ भारतीय समाज को शास्त्र सम्मत रुप से एकत्रित करने के लिए शंकरदेव ने सृष्टि किया एक सार्वजनीन उपासनास्थली नामघर। नामघर के मिणकूट में स्थापित सिंहासन को गुरु-आसन कहा जाता है। जगत गुरु श्रीमन्त शंकरदेव के नाम में ही यह आसन को गुरु-आसन कहा जाता हैं। गुरु आसन में भगवन्त कृष्ण का वाणी सम्बलित और श्रीमन्त शंकरदेव द्वारा रचित गुणमाला शास्त्र स्थापना किया जाता हैं। गुणमाला शास्त्र श्रीमद्भागवत का क्षुद्र रुप हैं।
(ठ) जगतगुरु श्रीमन्त शंकरदेव द्वारा स्थापित एक शरण हरि नाम धर्म का मूल मन्त्र कृष्ण भक्ति और प्राणी कल्याण केन्द्रित हैं। शंकरदेव ने उनके द्वारा विरचित शास्त्र समूह में हिन्दु, मूसलमान, ईसाइ, फ्रोंगली, असमीया, माराठी आदि जाति या पन्ठ सूचकत शब्द प्रयोग नही किया था। इसीलिए शंकरदेव दर्शन या शंकरदेव धर्म हैं सार्वजनीन और सभी तरह की अन्धबिश्वास और कुसंस्कार से मुक्त हैं। उनके यह उदार धर्म दर्शन में आकृष्ट हौ कर मुसलमान सम्प्रदाय के चांद खाँ ने शंकरदेव को गुरु मान के भगवान कृष्ण में शरण लिया था। शंकरदेव का धर्म दर्शन में परमात्मा कृष्ण का ही अलग अलग नाम ले कर भजन गाया जाता हैं। श्रीमन्त शंकरदेव संघ, नामधर्म समाज, भागवती बेष्णव धर्म समाज, इसकन आदि अनेक धर्मसंस्था समूह ने एक शरण हरि नाम धर्म को बिस्तारित रूप से प्रचार कर रहा हैं। श्रीमन्त शंकरदेव का धर्म-दर्शन का मूल-मन्त्र हैं –
ओम् कृष्ण ओम् कृष्ण
ओम् कृष्ण ओम् कृष्ण
कृष्ण राम कृष्ण राम
कृष्ण राम कृष्ण राम
हरि कृष्ण हरि राम
हरि कृष्ण हरि राम
ओम् कृष्ण ओम् कृष्ण
ओम् कृष्ण ओम् कृष्ण
शंकरदेव और उनके शिष्य माधवदेव ने अनेक भजन-कीर्तन रचना किए थे और यह सब भजन कीर्तन भारतीय समाज में सर्बजन विदित हैं।
श्रीमन्त शंकरदेव के रचना समूह के विषय में संक्षिप्त विश्लेषण –
सनातन धर्म के समस्त शास्त्रों का दो भाग किया गया हें – आगम शास्त्रों और निगम शास्त्रों में।
आगम शास्त्र – आगम शास्त्रो में मूर्ति-पूजन, बहु देव-देवीओं के पूजा-उपासना, बलि-विधान, जाति-भेद, अस्पृश्यता आदि का नियम-विधान हैं। आगम शास्त्रों में ब्राहृाजी, शिव जी, विष्णु, दुर्गा माता, काली माता आदि को मूर्ति का आकार दिया जाता हैं और उन सबको पुजा उपासना करने का नीति निर्देशना आगम शाश्त्रों में हैं। कालिका पुराण, योगिनी तन्त्र आदि आगम शास्त्रों में दूर्गा, काली आदि का शक्ति पुजा में पशु, पक्षी, मनुष्य आदि को बलि चड़ाने का विधान हैं। शक्ति पूजा में रक्त, मांस और मदिरा का परम आवश्यकता हैं –
रुधिरैर्मासमद्यैश्य पूजयेत् परमेश्वरीम्।