(योगिनी तन्त्रः 2819)
निगम शास्त्र – निगम शास्त्रो के सिद्धान्त के अनुसार परब्राहृ हैं निराकार और विश्व ब्राहृाण्ड का सृष्टि, पालन, संहार करने का अधिकारी हैं एकमात्र परब्राहृ अर्थात परमात्मा। निगम शास्त्र समूह यथा गीता, महाभागवत पुराण, पद्म पुराण, उपनिषद समूह ने देवकी नन्दन श्रीकृष्ण को परब्राहृ का नररूप कहकर स्वीकृति दिया और मान लिया हैं। श्रीमन्त शंकरदेव ने आगम शाश्त्रों के सिद्धान्त समूह का पालन निषेध किया और उन्होने घोषणा किया कि कर्मकाण्ड केन्द्रित आगम शास्त्र समूह का पालन एकमात्र अज्ञानी लोगों के लिए ही हैं। भगवन्त कृष्ण में भक्ति होने से स्वतःस्फूर्त भाव से विशिष्ट ज्ञान प्राप्त होगा और वे लोग भी निगम शास्त्रों के सिद्धान्त को पालन करंगे। इसलिए महापुरुष शंकरदेव जी ने कृष्णस्तु भगवान स्वयम् – यह सिद्धान्त दिया और उनके समस्त रचनाए कृष्ण-भक्ति केन्द्रित हैं।
श्रीमद्भागवत – महामुणि व्यासदेव जी द्वारा रचित संस्कृत महाभागवत पुराण का प्रथम अनुवाद हुआ असमीया भाषा में। श्रीमन्त शंकरदेव और उनके शिष्यगण द्वारा असमीया भाषा में अनुवादित श्रीमद्भागवत हैं भारतीय प्रादेशिक भाषाओं में प्रथम अनुवाद। श्रीमन्त शंकरदेव ने जो जो स्कन्ध अनुवाद किया, उस सम्बन्ध में आगे उल्लेख किया गया हैं। असमीया भाषा में द्वादश स्कन्धों का श्रीमद्भागवत अनुवाद होने के पश्चात लगभग अठारह या उन्निसवी शताव्दी में हिन्दी, उड़िया, तामिल, बोंगली, माराठी आदि भाषाओं में अनुवाद हुआ। श्रीमद्भागवत के सम्बन्ध में डः हीरेण गोहाँइ का मत सर्वभारतीय समाज व्यवस्था के दृश्यपट में अति महत्वपूर्ण माना जाएगा और यह हैं – मूल भागवत में शुद्र कुल के प्रगति को कलि युग का अधर्म तथा कलंक माना गया था। किन्तु शंकरदेव जी के भाषा में उस तरह वर्ण-विद्वेष-अस्पृश्यता के भाव नही हैं, किन्तु अस्पृथ्य जाति को भी आत्म विश्वास दिलाने वाली बाते कही और नीच कुत को भी प्रशंसा किया। (परम्मरा) श्रीमन्त शंकरदेव द्वारा अनुवादित स्कन्ध समूह किशोर-किशोरियों के लिए चित्त स्पर्श करने वाली गीत, युवाओं के लिए विज्ञान सन्मत स्वास्थ जीवन यापन का मन्त्र, विद्वान लोगो के लिए अनन्त ज्ञान का भाण्डार और भक्तो के लिए वैकुन्ठ का कल्पतरु हैं। अति सहज-सरल, प्रांजल तथा शिल्पी सुलभ प्रकाश भंगीमा से शंकरदेव जी ने श्रीमद्भागवत में पयार, छन्द, दुलड़ि छन्द, लेछारि छन्द आदि अनेक छन्द का प्रयोग किया।
कीर्तन घोषा – कीर्तन घोषा में मुठ सत्ताइस खंड या भाग है। प्रत्येक भाग में एक आख्यान या विषय होता है और प्रत्येक अख्यान में शास्त्र सम्मत व्याख्या के सहित भगवन्त कृष्ण का महिमायुक्त एक या अधिक कीर्तन रहता हैं। कीर्तन घोषा के कीर्तन समूह झुना, पयार, झुमुरा, दुलड़ि आदि नाना छन्दों में उन्होने रचना किया। प्रत्येक कीर्तन के दो भाग होते हैं – घोषा और पद। प्रत्येक छन्द के लिए सुर (च्र्द्वदड्ढ) अलग अलग होता हैं। यह फ्राात महत्वपूर्ण हैं कि इश्वर उपासना के लिए सुपरिकल्पित पद्धति से आसन ग्रहण करके नाम-प्रसंग करने का पद्धति, नाम-प्रसंग के अन्त में प्रसाद-विवरण और प्रसाद ग्रहण का सुपरिकल्पित व्यवस्था श्रीमन्त शंकरदेव जी ने ही प्रथम आविस्कार किया था। शंकरदेव (1449-1568 ॠ.क़्.) से चालीय वर्ष छोटे चैतन्यदेव (1486-1533ॠ.क़्.) ने बेंगल में राधा-कृष्ण का संकीर्तन प्रचार किया था। तत् पश्चात उत्तर भारत में श्रीमत् गोस्वामी तुलसी दास (1532-1680ॠ.क़्.) ने रामचरित मानस शास्त्र रचना करके राम नाम श्रवण-कीत्र्तन का व्यापक रुप से प्रचार किया। सोल्लह शताब्दी में जन्म ग्रहण करवेवाले सुर दास, मीरा बाई, केशब दास आदि प्रसिद्ध गायकारों ने कृष्ण-राम नाम के भजन का प्रचार किया।
गुणमाला शास्त्र – घोषा – राम निरंर्जन पातक भंजन।।
पद – नमो नारायण संसार कारण।।
भकत तारण तोमार चरण।
तुमि निरंजन पातक भंजन।
दानव गंजन गोपिका रंजन।।
वेदान्त गायक वंशी बायक।
जगत नायक मुकुति दायक।।
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