लगभग एक हजार चरण (थ्त्दड्ढ) युक्त यह शास्त्र स्तुति गीति काव्य के अंतर्गत हैं। घोषा (ध्रूं) भाग और पद भाग का प्रत्येक चरण में दो शब्दांश (द्मन्र्थ्थ्ठ्ठडथ्ड्ढ) होता है। शंकरदेव ने प्रत्येक शाफ्रदांश छः अक्षर से सृष्टि किया। प्रथम शब्दांश का अंतिम अक्षर (वर्ण) और द्वितीय शब्दांश का अंतिम अक्षर एकही हैं। और एक आश्चर्य यह हैं कि प्रत्येक प्रथम चरण का अंतिम वर्ण और द्वितीय चरण का अंतिम वर्ण भी एकही हैं। यह गुणमाला शास्त्र शंकरदेव नें कुसुम-माला छन्द में रचना किया था।
कोच बेहार राज्य के राजा नरनारायण के राजसभा में ब्रााहृण पण्डितो ने शंकरदेव जी के कीर्तिया को नीचा प्रतिपन्न करने के लिए बुद्धि रचे थे। उन पण्डितों ने राजाको अनुरोध किया कि शंकरदेव को एक रात में ही एक हाथी वध करके उसको चुना रखने वाली छोटीसी बाँस के पात्र में भरकर राजसभा में उपस्थित होना पड़ेगा। उस के बाद राजा के इच्छा अनुसार श्रीमन्त शंकरदेव ने एक रात में ही गुणमाला शास्त्र रचना करके दुसरे दिन मुटठी में ही लेकर आए और राजसभा मे गा कर सुनाए। यह गुणमाला शास्त्र को संक्षिप्त भागवत के नाम से भी जाना जाता हैं।
शंकरी साहित्य में अर्थात गीति काव्य, शास्त्र काव्य और नाट¬ काव्य में छन्द और अलंकार –
साहित्य नामक शरीर का प्राण है छन्द और अंग हैं अलंकार। छन्द, काव्य साहित्य को चेतना और अलंकार, सौन्दर्य प्रदान करता हैं। यदि काव्य साहित्य भक्ति-रच समृद्ध होता हैं उसी प्रकार साहित्य को ध्रुपदी साहित्य कहा जाता हैं। वर्तमान युग अर्थात किलयुग में श्रीमन्त शंकरदेव ही हैं कृष्ण-फ्राक्ति केन्द्रिक ध्रुपदी साहित्य के प्रितष्ठाता। महापुरुष श्रीमन्त शंकरदेव ने साहित्य सृष्टि के जरिए समाज, संस्कृति, धर्म और नित्य कर्म आदि सभी क्षेत्र को भक्ति रस से परिपूर्ण करके अन्धविश्वासहीन और विज्ञान सम्मत मानव समाज गठन करने का सिद्धान्त दिया था। असमीया काव्य साहित्य के छन्द-विशेषज्ञ डः महेन्द्र बरा जी ने उल्लेख किया कि शंकरदेव ने संस्कृत छन्द को नवीन रुप में स्थापना किया और गुरुजन ने स्वयम ही एकाधिक छन्दों का सृष्टि भी किया था। यथा-गुणमाला शास्त्र उन्होने कुसुममाला छन्द में रचना किया था। और एकाधिक बरगीत में हंसमाला छन्द, श्रीमद्भागवत के इन्द्र-बलि युद्ध वर्णन में व्यवहार किया झमक छन्द। उसके उपरान्त भी संस्कृत छन्द का जौगिक नीति में सरलता प्रदान किया और द्विपर्विक (एत्-द्मन्र्थ्थ्ठ्ठडथ्ड्ढड्ड), त्रिपर्विक (च्र्द्धत्-द्मन्र्थ्थ्ठ्ठडथ्ड्ढड्ड) छन्द को सुन्दर तथा परिपूर्ण रुप दिया था।
छन्द समूह हैं –
पयार छन्द (8 अ 6) – शफ्रदांश (च्न्र्थ्थ्ठ्ठडथ्ड्ढ) के संख्या दो होते हैं। प्रथम शब्दांश में आठ वर्ण और द्वितीय शब्दांश में छः वर्ण रहता हैं।
उदाहरण – त्रैलोक्यक आक्रमिला / चरणर गति।
तजु पादोदके गंगा / भैला उतपति।। (कीर्तन घोषा)
दुलड़ि छन्द ( 6 अ 6 अ 8) – शब्दांश के संख्या तीन हैं। प्रथम शब्दांश में छः, द्वितीय शब्दांश में छः और तृतीय शफ्रदांश में आठ वर्ण रहता हैं। और अन्य छन्द समूह हैं –
छवि छन्द (8अ8अ10), कुसुममाला(6अ6), झमक (68अ), झुना या एकावली छन्द (6अ5), हंसमाला छन्द (6अ6अ6), दिगक्षरा छन्द(4अ6), पाँचाली छन्द(6अ6अ6अ6) और झुमुरा छन्द(4अ4)।
शंकरदेव द्वारा रचित मधु दानव दारण देव वरं। वर वारिज लोचन चक्रधरं।। यह देव भटिमा त्रोटक छन्द में हैं। प्रत्येक प्रथण चरण (थ्त्दड्ढ) का अन्त वर्ण का पूर्व स्थित दो वर्ण और द्वितीय चरण का प्रथम दो वर्ण एकही हैं। यहा वर शब्द को ध्यान देने से छन्द का भी ज्ञान लाभ होगा।
इसके अलवा शंकरदेव ने उनके रचना समूह में प्रयोग किए हुए छन्द और अलंकार समूह के व्यवहारिक कोशलता विश्लेषण करने वाले विद्धान जनों को निश्चय ही अनुभव होगा कि जगत गुरु श्रीमन्त शंकरदेव सर्वकाल का सर्वश्रेष्ट साहित्यकार हैं। उन्होने रचना समूह में अनुप्रास, अंत्यानुप्रास, श्रूत्यनुप्रास, वृत्यनुप्रास, छकानुप्रास, लाटानुप्रास, श्लेष, उपमा, पुर्णपमा, लुप्तोपमा, रुपक, समासोक्ति, उतप्रेक्षा आदि शब्द-अलंकार पुरुषोत्तम पारदर्शिता सहित प्रयोग किए। शंकरदेव के लेखनी में शब्द समूह एकान्त आज्ञाकारी छात्र के तरह होते हैं और इस पारदर्शिता ने उनको विश्व साहित्य का भी गुरु के रुप में स्थापित किया।
