शंकरदेव संस्कृति (शंकरी संस्कृति)ः शंकरी गीत-नृत्य-वाद्य और साहित्य –
श्रीमन्त शंकरदेव ने गीत-नृत्य-वाद्य और साहित्य सृष्टि के द्वारा भारतीय संस्कृति में एक दुर्लभ चरित्र पूर्ण मौलिक धारा का प्रतिष्ठा किया। इसलिए शंकरदेव ने सृष्टि किया हुआ गीतम्-नृत्यम्-वाद्यम्-नाट¬म-काव्यम्-शास्त्रम् यह सफ्राको एकत्रित रुप से शंकरदेव संस्कृति (शंकरी संस्कृति) के नाम से जाना जाता हैं।
शंकरी गीत (शंकरदेव गीत) –
गीतम्-नृत्यम्-वाद्यम् त्रयम् संगीतमुच्यते – गीत-नृत्य और वाद्य यह तीनोको एकत्रित रुप से संगीत कहा जाता हैं। मीरावाई, कवीर, ज्योतिप्रसाद आगरवाला, रवीन्द्र नाथठाकुर आदि ने रचना किया हुवा गीत समूह को मीरा भजन, कवीर दोहा, ज्योति संगीत, रवीन्द्र संगीत के नाम से जाना जाता हैं। उसीतरह जगत गुरु श्रीमन्त शंकरदेव जी ने रचना किया हुआ गीत, नृत्य, वाद्य, साहित्य समूह को शंकरदेव गीत, शंकरदेव नृत्य, शंकरदेव वाद्य, शंकरदेव साहित्य के नाम से जाना जाता हैं। इसलिए शंकरदेव ने सृष्टि किया हुआ गीतम्, नृत्यम्, वाद्यम, नाट¬म, काव्यम, शास्त्रम् यह सब को एकत्रित रुप से शंकरदेव संस्कृति कहा जाता हैं। किन्त परमरागत रुप से शंकरी संस्कृति के नाम से भी जाना जाता हैं।
श्रीमन्त शंकरदेव ने रचना किया हुआ गीत समूह को शंकरी गीत या शंकरदेव गीत कहा जाता हैं। शंकरी गीत दो प्रकार के हैं – बरगीत और अंकीया नाटक का गीत। उन्होने पैतीस बरगीत और छः अंकीया नाटक के लिए एक सौ चौवालिस अंकीया गीत रचना किए थे। बरगीत और अंकीया गीत ब्राजभाषा में रचना किए थे। बरगीत और अंकीया गीत समूह के लिए शंकरदेव ने काल के अनुसार अलग अलग राग सृष्टि किए थे। अंकीया गीत समूह के लिए उन्होने निर्दिष्ट ताल का उल्लेख किया था। बरगीत में श्रुतिमधुरता के लिए गायकार ताल निर्वाचन कर सकता हैं। बरगीत और अंकीया गीत समूह ध्रुपदी गीत के अंतर्गत हैं। प्रत्येक गीत में दो भाग होते हैं – ध्रुं (स्थायी) और पद (अंतरा)। शंकरदेव ने सृष्टि किय हुआ राग समूह हैं वायुमण्डल, तिमिर, मेघमण्डल, अहिर, गौरी, तुर-वसंत, माहुर धनश्री, श्री, आशोवारी, कल्यान, केदार, सुहाइ, श्याम आदि। गुरु श्रीमंत शंकरदेव ने गीत में व्यवहार के लिए सृष्टि किया हुआ ताल समूह हैं परिताल, दोमाणि, एकताल, बरज्योति, घरमज्योति, रुपक, विषमज्योति, खरमान, रचक, आठोला, ओभता, आठोला, रुपगंज, माथ-ज्योति, उणज्योति, सरु-ज्योति आदि। साधारणतः एक बरगीत को एक ही ताल में गाया जाता हैं। किन्तु एक बरगीत का गायन पद्धति में एकाधिक ताल संयोग करके श्रवण में माधुर्य लाने का भी नियम हें और इस सम्फ्रान्ध में शंकरी गीत विश्लेषज्ञों में सें एक श्रीगोलाप महन्त जी ने उनका बरगीत-मुकुर नामक ग्रन्थ में उल्लेख किया हैं। शंकरी गीत बिलम्बित और मध्यलय में गाया जाता हैं। शंकरी गीत समूह सखित्व, दास्य, अपत्य, भक्ति, विरह, भक्ति प्रेम आदि भाव से परिपूर्ण हैं। ध्रुपदी गीत का आधार हैं राग, ताल, लय और भाव। यह चारो का संयोग हुआ बरगीत और अंकीया गीतों में। इसलिए बरगीत और अंकीया गीत समूह उच्चतम गुण सम्पंन ध्रुपदी गीत के रुप में सर्वजन विदित और स्वीकृत हैं।
शंकरी नृत्य (शंकरदेव नृत्य) – शंकरदेव ने सृष्टि किया हुआ नृत्य को शंकरी नृत्य या शंकरदेव नृत्य कहा जाता हैं। आंगिक, वाचिक ओर आहार्य यह तीन प्रकार के अभिनय शंकरी नृत्य का आधार हैं। गुरुजन ने मुठ चौसठ (64 ग़्दृद्म.) माटि-आखड़ा (करण) सृष्टि किया था। दो या ततोधिक माटि आखड़ा मिल के एक नृत्य होता हैं। शंकरी नृत्य समूह हैं नाडुभंगी नृत्य, सूत्रधारी नृत्य, शिशु कृष्ण नृत्य, गोसाइ नृत्य, चालि नृत्य, झुमुरा नृत्य, गोपी नृत्य, दशावतार नृत्य आदि।