सुत्रधारी नृत्य – शंकरदेव ने अंकीया नाट में सुत्रधार नामक एक चरित्र (ड़ण्ठ्ठद्धठ्ठड़द्यड्ढद्ध) सृष्टि किया था। सुत्रधार नाटक और दर्शक के बीच में संयोगकारी और चालिकाशक्ति के रुप में काम करता हैं।
नाडुभंगी नृत्य – भगवान श्रीकृष्ण ने वृन्दावन में बन्धुवर्ग के साथ गाय चराने के समय में किया हुआ नृत्य को नाडुभंगी नृत्य कहा जाता हैं।
शिशु-कृष्ण नृत्य – श्रीकृष्ण का शिशु लीला को अवलम्बन करके शंकरदेव ने शिशु कृष्ण नृत्य सृष्टि किया था। कालिय दमन नृत्य शिशु कृष्ण नृत्यका उदाहरण हैं।
चालि नृत्य – रासलीला में श्रीकृष्ण ने गोपीओं के साथ मयुर पक्षी का नृत्य भंगीमा से जो नृत्य किया था उसीको चालि नृत्य के नाम से जाना जाता हैं।
झुमुरा नृत्य – रासलीला में एक बार गोपीओं को अहंकार हुआ था। तब श्रीकृष्ण अंतद्र्धान हो गए थे। तत् पश्चात गोपीगण परम दुःखित हो गए। गोपीओंका दुःख प्रकट करने के लिए श्रीमन्त शंकरदेव ने झुमुरा नृत्य का सृष्टि किया।
गोपी नृत्य – रासलीला में गोपीओं का आनन्द प्रकट करने के लिए गुरुजन ने झुमुरा नृत्य सृष्टि किया।
ध्रुपदी नृत्य में हाथ और पाँव का चाल या गति को एकत्रित रुप में करण के नाम से जाना जाता है। यथा –
हाथ का चाल – यह दो प्रकार के होते हैं, यथा असंयुक्त हस्त संचालन और संयुक्त हस्त संचालन। शंकरी नृत्य में असंयुक्त हस्त संचालन अठाइस प्रकार के होते हैं और संयुक्त हस्त संचालन तेइस प्रकार के हैं। हस्त संचालन या हाथ का चाल हैं मयुर, सिंहमुख, मत्स्य, कुर्म आदि।
पद-चाल – पद संचालन या पाँव के गति हैं चार प्रकार के। यथा – मण्डल (स्थिर अवस्थान), भ्रमरी (उरणगति), उत्प्लावन (कुदना) और पदचारी (गमन)
शंकरी वाद्य या शंकरदेव वाद्य – महापुरुष शंकरदेव ने वाद्ययन्त्र के रुप में खोल सृष्टि किया था और यह एक नवीनतम तथा मौलिक सृष्टि हैं। क्योकि चमड़ा से निर्मित वाद्य यथा ढोल, मादल, मृदंग आदि के आकृति और प्रकृति खोल से संपूर्ण भिन्न हैं।
भारतीय ध्रुपदी संगीत का प्रथम वाद्य यन्त्र है खोल। उसके के फ्रााद उन्निसवी ँशाताव्दी में भाटखाण्डे ने दाइना-तफ्राला सृष्टि किया था। कर्माटकी, औडिसी, कथक की बात करे तो वह भी सोल्लह-सतारह शताव्दी में अर्थात शंकरदेव के पश्चात काल का ही हैं। भारतवर्ष का ऐतिहासिक पटभूमि के आधार पर विश्लेषण करने से यह स्पष्ट होता हैं कि एकादश शताव्दी में मुसलमान राजा मोहम्मद घोरी के किए हुए आक्रमण के बाद ही भारत भूमि में मुसलमान का राज आरम्भ हुआ। उस के बाद ब्रिाटिस लोगो का भारतवर्ष में प्रवेश हुआ सोल्लहवाँ शताब्दी में। अठारहवाँ शताव्दी में ब्रिाटिस ने भारतवर्ष में राजनीतिक शक्ति के रुप में आत्म प्रकाश किया और प्रभाव विस्तार करने लगे। इसी के साथ मुसलमान राज समाप्त हुआ। मुसलमान राजाओं के शासन के पुर्व, भारतवर्ष में तथा सारे विश्व में ध्रुपदी गीत-नृत्य-वाद्य का सृष्टि नही हुआ था। भरत मुनि मे पाचँवा (5द्यण्) शताव्दी में ही भरत नाट¬ शास्त्र रचना किया था, किन्तु वह नाट¬ शास्त्र व्यवहारिक रुप में प्रकाश नही हुआ था और केवल तत्व ज्ञान के रुप में शास्त्र में ही था।
मुसलमान राजा के शासन काल के पूर्व, अर्थात हिन्दु राजाओ के समय में भारतवर्ष के मंदिरों में देवदासी नृत्य और राज प्रासाद मे मुजरा नृत्य का प्रचलन था। उस के बाद मुसलमान राजाओ के शासन काल में अर्थात मुसलमान के शेख बहाउद्दिन और गुजरात के सुलतान हुसेन के पहल से भारतवर्ष में इराणी (क्ष्द्धठ्ठदत्ठ्ठद) राग का प्रवेश हुआ।
उसी समय में 1449 ॠ.क़्. (खृष्टाव्द) में जगतगुरु श्रीमन्त शंकरदेव का आविर्भाव हुआ और उन्होने बेजान, लुप्तप्राय भारतीय संस्कृति को पुणःस्थापना करने के लिए प्रतिज्ञावद्ध हुए। तत् पश्चात अनेक शास्त्रों, गीत, नृत्य, वाद्य काव्यरचना करके शंकरदेव जी ने उनका मौलिक यागदानद्वारा भारतीय संस्कृति को एक विशेष धारा प्रदान किया हैं। शंकरदेव ने सृष्टि किया हुआ यह संस्कृति को शंकरी संस्कृति या शंकरदेव संस्कृति कहा जाता हैं।
शंकरदेव (1449-1568 ॠ.क़्.) के बाद भारतीय संस्कृति को रक्षा करने के लिए गोवालियर के राजा मानसिं तोमार के नेतृत्व में गायक तानसेन (1506-1589ॠ.क़्.) वैजु, बखशु, रामदास, दिरंग खाँ आदि ने ध्रूबपद रचना किया था। उस के बाद कर्नाटकी पद्धति का ध्रुपदी गीत सृष्टि किया था रामामात्य (जन्म हुआ था 1550ॠ.क़्.) ने। उसके बाद भाटखाण्डे ने उन्निसवीं शताव्दी में हुन्दुस्तानी पद्धति का गीत-नृत्य-वाद्य सृष्टि किया और इसी को भारत नाट¬म या भरत नाट¬म के नाम से जाना जाता हैं।
जगत गुरु श्रीमन्त शंकरदेव का जीवन और कर्म के सम्बन्ध में पन्द्रहवाँ शताव्दी में ही अर्थात गुरुजन के जीवन काल से ही गुरुचरित रचना कार्य आरम्भ हुआ था। रामचरण टाकुर, दैत्तारि ठाकुर, रामानन्द, भूषण द्विज, चक्रपाणि वैरागी आदि ने गुरुचरित लिखा था। जगतगुरु श्रीमन्त शंकरदेव के जीवन और कर्म के विषय में शंकरदेव के समय के शिष्यगण द्वारा रचना किया गया चरित ग्रन्थ को गुरुचरित कहा जाता हैं। उन्निसवी-बिसवी-इक्किसवी शताव्दी में गुरुचरित समूह विश्लेषण तथा अन्वेषण करके दीननाथ बेजबरुवा, लक्ष्मीनाथ बेजबरुवा, डः महेश्वर नेओग और अनेक पण्डितों ने सम्पादना किया था। डः संजीव कुमार फ्रारकाकति जी ने उनके अन्वेषण मूलक रचना में उल्लेख किया कि –
“ख्र्त्त्त्ड्ढ ण्त्द्म ड्डठ्ठदड़ड्ढद्म, च्द्धत्थ्र्ठ्ठदद्यठ्ठ च्ठ्ठदत्त्ठ्ठद्धड्डड्ढध्ठ्ठ’द्म द्मदृदढ़द्म ठ्ठथ्द्मदृ ध्र्ड्ढद्धड्ढ दृद्धत्ढ़त्दठ्ठथ् ड़द्धड्ढठ्ठद्यत्दृदद्म. क्तत्द्म द्मदृदढ़द्म थ्ठ्ठद्वदड़ण्ड्ढड्ड ठ्ठ ध्र्ण्दृथ्ड्ढ दड्ढध्र् द्मड़ण्दृदृथ् दृढ ड़थ्ठ्ठद्मद्मत्ड़ठ्ठथ् थ्र्द्वद्मत्ड़ त्द क्ष्दड्डत्ठ्ठ. च्र्ण्त्द्म द्मड़ण्दृदृथ् त्द्म ड्डत्ढढड्ढद्धड्ढदद्य ढद्धदृथ्र् डदृद्यण् द्यण्ड्ढ क्तत्दड्डद्वद्मद्यठ्ठदत् ठ्ठदड्ड क्ठ्ठद्धदठ्ठद्यत्ड़ द्मड़ण्दृदृथ्द्म.”
(क़्द्ध. च्ठ्ठदत्र्ड्ढड्ढध् ख़्द्वथ्र्ठ्ठद्ध एदृद्धत्त्ठ्ठत्त्दृद्यन्र्, त्द ण्त्द्म द्धड्ढद्मड्ढठ्ठद्धड़ण् ठ्ठद्धद्यत्ड़थ्ड्ढ द्यत्द्यथ्ड्ढड्ड दृद्धत्ढ़त्दठ्ठथ्त्द्यन्र् दृढ च्द्धत्थ्र्ठ्ठदद्यठ्ठ च्ठ्ठदत्त्ठ्ठद्धड्डड्ढध्ठ्ठ’द्म ड़दृदद्यद्धत्डद्वद्यत्दृद, द्रद्वडथ्त्द्मण्ड्ढड्ड डन्र् च्द्धत्थ्र्ठ्ठदद्यठ्ठ च्ण्ठ्ठदत्त्ठ्ठद्धड्डड्ढध् च्ठ्ठदढ़ण्ठ्ठ त्द द्यण्ड्ढ द्मदृद्वध्ड्ढदत्द्ध ॠठ्ठत्त्ठ्ठठ्ठद्मण्ड्ढड्ढ क्रठ्ठदढ़ठ्ठठ्ठ 2006).
उपरिउक्त विश्लेषण से यह प्रमाण होता हैं कि जगत गुरु श्रीमन्त शंकरदेव ने व्यवहारिक और संस्कारित रुप में भारतीय संस्कृति को स्थापना किया था। इसलिए श्रीमन्त शंकरदेव एक शरण हरि नाम धर्म और भारतीय संस्कृति के गुरु के रुप में सर्वजन विदित हैं।
वैकुन्ठ प्रयाण (देह त्याग) –
जगत गुरु श्रीमन्त शंकरदेव ने नरलीला समाप्त करके अंग्रेजी वर्ष के अनुसार 1568ॠ.क़्.में वैकुन्ठगामी हुआ और शकाव्द के अनुसार 1490 शकाव्द का भाद्र महीना का शुक्ला द्वितीया तिथि में उनका महाप्रयाण हुआ था। गुरुजन का वैकुन्ठ प्रयाण का स्थान हैं कौच बेहार राज्य का मधुपुर नामक थान में। उनका जीवन काल हैं एक सौ उन्निस वर्ष।
अन्त में विश्व शान्ति और प्रगति के लिए ईश्वरको प्रार्थना करता हूँ। विश्ववासी विज्ञानसम्मत रुप से ईश्वरमुखी रहे, और इसी लक्ष कों प्राप्त करने के लिए विश्ववासी को ईश्वर का आशीर्वाद और जगत गुरु श्रीमन्त शंकरदेव का कृपा दृष्टि प्राप्त हौ।
विश्ववासी को प्रणाम।

डाः पराग भूञा (ग्रन्थकार)
वेटेरिनेरी अफिचार
अरुणाचल प्रदेश (भारत)