3) महत् शक्ति तत्व
ठ्ठ) नाहि क्षय वृद्धि यिटी जन्म मृत्यु हीन।
समस्तते साक्षी रुपे आछा उदासीन।। (191)
(श्रीमद्भागवतः एकादश स्कन्ध, निमिनव सिद्ध संफ्रााद)
परम शक्ति का नही क्षय वृद्धि, जो जन्म-मृत्यु हीन।
ओ परम शक्ति सफ्रा में, रहते है होके उदासीन।। (191)
परमात्मा हरि विज्ञान मूर्ति
निराकार निरामय,
नित्य निरञ्जन आनन्द स्वरूप
नहीं है देह इन्द्रीय।
4) मानव शरीर रचनाशास्त्र

देहर महिमा आवे शुणियो फ्रोकते।
बहृांडर गूण माने आछे शरीरते।।
समस्ते चैबिश तत्व करिला निम्र्मान।
आपुनार छवान्नबै आंगुल प्रमाण।। (201)
पिठिर मध्यत मेरु मंडल प्रकाश।
उद्र्धे सूर्य अधे चंन्द्र वायुर निवास।।
षोल्ल षोल्ल गोटा अस्थि पंजरत तार।
अघे उद्धे आछे तार नवखान द्वार।। (202)
दुइ काण दुइ नाक दुइ चक्षु देखा।
मुखे एरे उपरत सात खान लेखा।।
अधे गुह्र लिंग एहि नवखान द्वार।
आछे आरो नाड़ी ताते सत्वरि हाजार।। (203)
ताहाते संचारि फुरै प्राण वायु दश।
नख केश पर्यन्ते चलावे अन्न रस।।
परम तृपिति होवै इंन्द्रिय सफल।
बाढ़ि याइ शरीरत आति तेज फ्राल।। (204)
नाड़ीर मध्यत तिनि नाड़ी अनुपाम।
सुषुम्ना पिंगला इड़ा नाड़ी यार नाम।
सुषुम्ना उत्तम आति तिनिरो मध्यत।
यिटी बयापि आछै गैया सूर्य मण्डलत।। (205)
छय खान चक्र आछै बौढ़ि शरीरत।
गुह्र लिंग नाभि ह्मद्दि तालु ललाटत।।
चारि दल छय दल नाभि दश दल।
आछै अष्टादश पद्म ह्मदय निर्मल।। (206)
तालुत षोड़श ललाटन दल दुइ।
योगशास्त्र मते छय चक्र एहि हुइ।।
आपुनि ईश्वर आछा ह्मदय कमलै।
शुभाशुभ भुंजान्त जीवक कर्मफले।। (207)
शुणियोक आवे मध्य देह यिटी स्थान।
शरीरत बिचारिया लैयोक प्रमाण।।
गुह्र स्थान हन्ते दुइ आंगुल उपरे।
अन्डकोष हन्ते दुइ आंगुलत परे।। (208)
ताके बुलि देह मध्य अग्निर निबास।
तप्त जम्बु नदी येन सोणार प्रकाश।।
कोन कोन दश वायु आछे शरीरत।
ताहार शुणियो नाम करिबो बेकत।। (209)
अधे उद्र्धे संचरिया फुरे स्थाने स्थान।
पान अपान बयान समान उदान।।
नाग कुम्र्म कृकर वायुत अनुपाम।
देवदत्त धनंजय एहि दश नाम।। (210)
सुषुम्ना आछय मेरू मज्जार भितर।
यात वायु पशिले अजर रोवे नर।।
ताहार मुखत ढाकि आछे कूंडलिनी।
मायार शकति येन देखिया सर्पिनी।। (211)
(श्रीमद्भागवतः तृतीय स्कन्ध, अनादिपातन)