प्रस्तावना
जगत गुरु श्रीमन्त शंकरदेव रचित शास्त्र समूह से प्रासंगिक पद-धोषा समूह निर्वाचन करके एक शरण हरि नाम धर्मका सिद्धान्तों को ग्रन्थकार ने संक्षिप्त रुप में प्रकाश करने का प्रयास किया हैं। असमीया भाषा में रचित ये पदघोषा की हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद कर के ग्रन्थकार ने असमीया भाषा के अनभ्यस्त पाठकवर्गो को उपकृत किया हैं। ग्रन्थ भाग में सन्निविष्ट समूह पदघोषा के जरिए गुरुजन के धर्मीय मतादर्श में अन्तर्भूक्त वैज्ञानिक उपादान समूह को कुशलता से स्थापित किया गया। इसके उपरान्त वैदान्तिक सिद्धान्त और भक्ति मार्ग की श्रेष्ठता प्रितपन्न किया गया हैं। ग्रन्थकार ने गुरुजन को सिद्धान्तों के जरिए ज्ञानमार्ग और कर्म-मार्ग की असारता प्रतिपन्न किया हैं। एकेश्वरवाद के साधन मार्ग कृष्ण-नाम की महिमा कुशलता के सहित स्थापित किया गया हैं। कर्मकाण्ड की असारता प्रतीत पदों में भक्त और भक्ति की महिमा वर्णित हुआ हैं। मानव शरीर की यथार्थता, भारतवर्ष की महिमा प्रकट करने वाली घोषा पदों ने ग्रन्थ को अधिक तत्वभावपूर्ण कर डाला हैं। दो-एक स्थान पर चरित पुथि के पद और रामायण महाकाव्य के पद सन्निविष्ट करके ग्रन्थ की मर्यादा श्रीवृद्धि की गयी हैं।
जगत गुरु श्रीमन्त शंकरदेव ने विश्ववासी के लिए प्रदान किया हुआ अवदानों को ग्रन्थकार ने विषय के अनुसार अलग अलग भागों में दिखाया हैं। गुरुजन के अमृत सिद्धान्त समूह हिन्दी और अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करके श्रीमन्त शंकरदेव को विश्व में परिचय कराने में प्रथ्यकार ने प्रशंसनीय योगदान दिया।
ग्रन्थको इस प्रकार अनुवाद और सम्पादना कार्य में शारीरिक, मानसिक परिश्रम का भाग लेना महसुह होता हैं। पाठकगण उपकृत होनो से ग्रन्थकार का परिश्रम सार्थक होगा। अंत में डाः पराग भूञा जी का गुरु धर्म के प्रति एकान्त श्रद्धा-भक्ति को सश्रद्ध कृतज्ञता ज्ञापन करता हूँ।
इति
सेवा सहित
श्री हरि प्रसाद हाजिरका
प्रधान सम्पादक
श्रीमन्त शंकरदेव संघ
मूल कार्यालय – नगाओ टाउन
कलंपार, हलधर भुञा पथ
37 नं राष्ट्रीय पथ के समीप
जिला – नगाओ
राज्य – असम (भारत)
