गुदा-स्थान लिंग नाभि में रहता हैं चार, छः और दस कमल-दल अनुक्रम,
ह्मदय में रहता है अठारह कमल-दल अनुपम। (206)
सिर में सेलह और ललाट में हैं दो,
योग शास्त्र के अनुसार यही है छः चक्र, जान लो।
रहते हो ह्मदय-कमल में हे ईश्वर तुम स्वयम्,
और जीव को प्राप्त करवाते हो यथा कर्म तथा फलम्।। (207)
अब सुनो शरीर का मध्य-स्थान के विषय में,
ले लो इसका प्रमाण शरीर में खोज के।
मलद्वार से दो अँगुली उद्र्ध में हैं यह मध्य-स्थान,
अंडकोष से दो अँगुली निम्न में है यह मध्य-स्थान। (208)
शरीर का मध्य-स्थान में हैं जीवन-उर्जा का निवास-स्थान,
जीवन-उर्जा बहती है इसी में, हैं उष्ण और उच्वल यह स्थान।
कौन कौन सी हैं दस वायु इस शरीर में………
सुनो-उस सफ्रा के नाम, कहता हुँ में। (209)
शरीर का निम्न-उद्र्ध सभी स्थान में संचारित होते हैं यह दस-वायु,
और उन सफ्रा का नाम है पान, अपान,
फ्रयान, समान, उद्यान, नाग, कुम्र्म,
कृकर, देवदत्त, धनंजय। (210)
स्पाइनेल कर्ड रहता हैं रीड़-स्तम्भ के भितर,
और जिस में वायु प्रवेश करने से हो जाता हैं मनुस्य अमर।
स्पाइनेल कर्ड का निम्न भाग के अंत बिन्दु में हैं कुंडलिनी (सुप्त ब्राहृ शक्ति),
कुंडलिनी हैं ईश्वर का माया-शक्ति, जो देखने में लगता हैं सर्पिनी। (211)

5) जीव-देह सृष्टि का चौबिश तत्व

गंध-गुण परश शवद रुप रस।
एघार इंद्रिय समे बिकार षोड़श।। (75)
पंचभूत प्रकृति महत्व अहंकार।
चैबिश तत्वर कथा करिबो प्रचार।।
एहि क्रमे स्त्रजिला चौबिश महा तत्व।
ब्राहृांड स्त्रजिते केहो नूहिके शकत।। (76)
कृष्णक करिला स्त्तुति पाछे तत्वगण।
जीवरुपे सवातो पशिला नारायण।।
जगतर कारण चोबिश महातत्व।
ईश्वरर इच्छाये सवे भैला एकमत।।(77)
(श्रीमद्भागवतः तृतीय स्कन्ध, अनादि पातन)