द्वितीय अध्याय
- ईश्वर कृष्ण का भिन्न नाम सृष्टि स्थिति प्रलयर हेतु यिटो देव।
यात परे परम ईश्वर नाहि केव।। (178)
स्वप्न जागरण यिटो निर्भर निद्रान।
समाधित साक्षिरुपे थाकन्त साक्षात।।
सचेतन कराइ देह प्राण इन्द्रियक।
जीवक भुन्जान्त नानाविध बिषयक।। (179)
परमात्मा बुलि ताक कहे मुनिगण।
तेहेन्ते परम तत्व जानिबा राजन।।
हरि हर बिधि यार थाके आज्ञ्या धरि।
ईश्वररो ईश्वर तेहेन्ते महा हरि।। (180)
तांक नारायण बुलि जानिबा नृपति।
ताहानेसे चरण सेवाये साधे गति।।
प्रवर्तान्त येखने इन्द्रिय समस्तक।
परमात्मा तेखने बुलिय माधवक।। (181)
समाधित बेकत होवन्ते गुछे भ्रम।
बुलिय तेखने जाना माधवक ब्राहृ।।
करन्त येखने इटो सृष्टि स्थिति अन्त।
बुलिय तेखने माधवक भगवन्त।। (182)
ब्राहृ परमात्मा भगवन्त एके तत्व।
एकेरेसे तिनि नाम लक्षण भेदत।। (183)
(श्रीमद्भागवतः एकादश स्कन्ध, निमिनवसिद्ध संवाद)
हिन्दी अनुवाद – अलप अलप कर्म ओर लक्षण भेदमे सत्-सित्-आनन्द रुप कृष्ण का नाम भिन्न होते हैं। कृष्ण हि परम ब्राहृ हैं। उपरिउक्त वर्णन स्पष्ट रुप से भाव प्रकाशक हैं, इसलिए अनुवाद निस्प्रयोजन। - देवकी नन्दन श्रीकृष्णः पूर्णब्राहृ कृष्ण
