ठ्ठ) नम्रभावे करि कृतान्जलि जानुपारि।
आरभ्भिला महा तुति ब्राहृा त्रिपुरारि।। (70)
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यिटो जगतरे अन्तर्यामी ब्राहृमय।
देखो विद्यमाने किनो भैला भाग्योदय।। (71)
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एतेके जगते चिन्ते तोमार चरण।
प्रणामो परम महेश्वर नारायण।। (72)
तप जप तीर्थ हेन नकरे पवित्र।
ये शुद्ध होवे शुणि तोमार चरित्र।। (73)
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एतेके पशिलो सबे तोमात शरणे।
अगतिर गति प्रभू करियो चरणे।। (78)
तोमारेसे किंकर यतेक जीव आमि।
जगतके प्रवर्तावा तुमि अन्तर्यामी।। (79)
(श्रीमद्भागवतः एकादश स्कन्ध)
नम्रभाव होकर किए कृताञ्जलि घुटने पे झुक कर,
किया आरम्भ महा स्तुति ब्राहृा और शिव जी ने। (70)
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जो हे जगतके अन्तर्यामी ब्राहृमय,
दर्शण हुआ उन्ही का साक्षात, हुआ भाग्योदय। (71)
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इसलिए जगत ने चिन्तन करता है तुम्हारे चरण,
करते हैं प्रणाम हमलोग, हे महा ईश्वर नारायण। (72)
तप जप तीर्थ ये करते नही पवित्र,
परन्तु शुद्ध होते हैं नर, सुनके तुम्हारे चरित्र। (73)
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इसीलिए लेते हैं हम सबलोग तुमरे शरण,
अगति का गति हैं प्रतीक प्रभू का चरण। (78)
तुम्हारे ही किंकर जीतने हैं जीव हम,
जगत के पालनकर्ता अन्तर्यामी हो तुम।। (79)
