तृतीय अध्याय

  1. अद्वैतवाद

ठ्ठ) भगवन्त को करता हुँ नमन जो सर्वदा करते हैं
दया भक्तों पे,
सृष्टि स्थिति लय करते रहते हैं
जिसकी माया की कटाक्ष में। (1)
जितने है अवतार (भगवन्त) का हैं विभूति
उसी महाहरि का नाम।
उसी ईश्वर कृष्णको करता हुँ
सहस्त्र कोटि प्रणाम।।(2)

ड) कृष्णेसे ईश्वर चराचर जगतर।
यार आज्ञा पालि ब्राहृा विष्णु महेश्वर।।
सृष्टि स्थिति प्रलय करन्त भिन्ने भिन्ने।
अनादि अनन्त कोन आछै तान्त बिने।। (321)
(श्रीमद्भागवतः षष्ठ स्कन्ध, अजामिल उपाक्षान)

कृष्णही ईश्वर चराचर जगत की, जिसकी आज्ञा पालन करते ब्राहृा विष्णु रुद्र, (जो) सृष्टि स्थिति प्रलय करते हैं भिन्न भिन्न से, अनादि अनन्त कृष्ण बिन और कौन है जगत में। (321)

  1. ईश्वर कृष्ण का अमृत वाणी

ठ्ठ) सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकम् शारणम् व्रज।
अहम त्वाम सर्वपापपेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ।। (66)
(भगवन्त कृष्ण का वाणीः गीताः अठारह अध्याय)
सर्वधर्म परित्याग करके एकमात्र मूझमें ही शरण लो,
मैं तुमके सभी पापो से मुक्ति दुँगा, शोक मत करो।। (66)

ड) आत्मज्ञानी गणो होवै मायाये मोहित।
जानि मोर सेवात एकान्ते दिया चित्त।।
नकरिवा सेवा सखि आन देवतार।
नुहि येन आहृार भकति व्यभिचार।। (251)
(श्रीमद्भागवतः एकादश स्कन्ध, उद्धव संवाद)
आत्मज्ञानी जन भी होते हैं माया से मोहित,
यह जानकर मूझ में ही दो एकान्त चित।
मत करना सेवा सखा अन्य देवताऔं की,
होना नही चाहिए मेरी भक्ति का व्यभिचार।। (251)