हेन मोक बिचारिबे साधुर संगत। ज्ञान विज्ञान तेबे बैवेक बेकत।। (231) श्रवण कीर्तन मोर रहस्य भकति। आकेसे करिबा मात्र बिवक्षा सम्प्रति।। (232) (श्रीमद्भागवतः द्वितीय स्कन्ध) इसलिए मुझको जब धूँढ़ेगे लोग सत्संग में, ज्ञान विज्ञान का तव होगा प्रकाश। (231) श्ववण कीर्तन है मेरी भक्ति का रहस्य, इसको ही करता सम्प्रति प्रकाश ।। (232)
- कृष्ण में एक शरण,
सर्वधर्म एरि एक शरण साक्षात।
सूदृढ़ बिश्वासे सखि लयोक आमात।। (190)
नकरिबा भय हेरा करो अंगीकार।
समस्ते पापते मइ करिबो निस्तार।। (191)
(श्रीमद्भागवतः एकादश स्कन्ध)
सफ्र्राधर्म परित्याग करके, सूदृढ़ विश्वास रख के
एक शरण सखा लेलो मुझपर, (190)
मत करना आशंका, देता हुँ यह वचन
समस्त पापों से मैं करुँगा निस्तार।। (191) समस्त शास्त्रर सार उद्धारिया आनि।
देखाइला विदित करि देव चक्रपाणि।।
यिटो शास्त्र कहिलन्त देवकी तनय।
सेहि मात्र शास्त्र एक जानिबा निश्चय।।
देवकीर पुत्र एक कृष्ण मात्र देव।
धर्म एक मात्र सेइ देवतार सेव।।
मन्त्र एक तान नामे कृष्ण देवतार।
भगवन्ते इतो करिलन्त सारोद्धार।।
(श्रीमन्त शंकरदेव रचित संस्कृत भक्ति रत्नाकर का अनुवादः रत्नाकर भास्य)
सर्व शास्त्रों का सार करके उद्धार,
दिखाया जगतको देव चक्रपाणि।
जो शास्त्र कह दिया देवकी तनय,
वही मात्र शास्त्र एक जानलो निश्चय।
देवकी पुत्र कृष्ण ही हैं मात्र एक देव,
और कृष्ण का सेवाही है एक मात्र धर्म।
मन्त्र है एत मात्र कृष्ण नाम,
भगवन्त ने किया हैं यह सार उद्धार।।
