1. एक शरण हरि नाम धर्म

बुजिवा शास्त्रर मज्जा कृष्णेसे देवर राजा
हरिनाम धर्मर ईश्वर।
यत तप तीर्थ स्नान याग योग महा ज्ञान
जाना सवे नामर किंकर।। (423)
(श्रीमद्भागवतः षष्ठ स्कन्ध, अजामिल उपाक्षान)

समझना सार शास्त्रोंका कृष्णही हैं राजा देवोंका
हरिनाम हैं धर्म का ईश्वर,
तप तीर्थ स्नान यज्ञ योग ज्ञान
जानिए, सब है हरिनाम की किंकर।। (423)

नाम लैले माधवे नेरन्त तार काछ। येन धेनु स्नेहत वत्सर नेरे पास।। नाम धर्म हेनसे हरिक करै वश्य। नामर महिमा इटो वेदर सहस्य।। (176) (श्रीमद्भागवतः षष्ट स्कन्ध, अजामिल उपाक्षान) कृष्ण नाम लेने वालें का साथ छोड़ता नही ईश्वर कृष्णने, जैसे गाय छोड़ती नही बात्सा को एक पल भी अकेले। नाम-धर्म करते हे हरिको भी वश में, यह हैं हरि-नाम की महिमा और वेद का रहस्य। (176)

ड़)
चार वेद चौदह शास्त्र सबका हैं यही तत्व
मुख्य धर्म हैं हरिगुण नाम,
यह तत्व जानके समाज के सब प्राणी
फ्राोलो जय राम राम।। (130)

ड्ड) परम बान्धव हरिर नाम।
यिजने आक लवै अविश्राम।।
तार सात कार्य साधिबे देखा।
प्रति प्रति लोवा सातरो लेखा।। (64)
प्रथमे दहिबे पातकचय।
करिबे महापुण्य अभ्यूदय।।
कराइबे बिषयत बिरकति।
कृष्णत पोवाइबे प्रेम भकति।। (65)
उपजाइबे आति बेष्णव ज्ञान।
मायाको दहिया करै निर्याण।।
चेतन्य मूर्ति पुर्णानन्द हरि।
थैबन्त तेन्ते एरे एक करि। (66)
तेबेसे नाम हैब उपशान्त।
कहिलो परम तत्व एकान्त।। (67)
(कीर्तन घोषाः नाम अपराध)
परम बान्धव हरि का नाम,
लेते है इसको जो अविश्राम।
हरि नाम करते सात कार्य समापन,
ले लो उसका प्रमाण, हे साधु जन। (64)
पहले करते है पाप का दहन,
करेंगे महा पुण्य का अभ्यूदय।
करेंगे सांसारिक क्लेश को दूर,
उपजाएँगे कृष्ण में प्रेम भक्ति। (65)
जागृत होंगे वैष्णव ज्ञान,
नष्ट होगी माया, होगी उलपन्न शुद्ध भक्ति।
चेतना के रूप में बिराजता सब जीव में पुर्णानन्द हरि
और हरि नाम तव होंगे एकात्मक। (66)
तभी होंगे हरि नाम शान्त और पुर्णरुप,
कह दिया मैने परम तत्व हरि नाम का।।(67)