एक शरण हरि नाम धर्म का चार तत्वों
ठ्ठ)
श्रीमन्त शंकर हरि भकतर
चाना येन कल्पतरु।
ताहान्त बिनाय नाइ नाइ नाइ
आमार परम गुरु।। (375)
(नामघोषाः महापुरुष श्री श्री माधवदेव)
श्रीमन्त शंकरदेव हरि भक्तों का,
जानो हैं कल्पतरु,
उनके सिवाय कोई भी नही नही नही
हमारा परम गुरु। (375) श्रीमन्त शंकरे पाछे कहिला सादरि।
श्रवण कीर्तन मात्र जाना निष्ठ करि।।
बुलिला आकेसे गुरु शंकरे आमाक।
आत करि सूगम नाहिके धरिबाक।।
(महापुरुष श्रीश्री दामोदर देव का उक्तिः श्रीश्री वंशीगोपाल चरित में वर्णित)
श्रीमन्त शंकरदेव ने कहा आदर के सहितः
श्रवण कीर्तन हैं मात्र उचित।
यही वोले थे गुरु शंकरदेव हम सबको,
इस से सूगम पथ और नहि, और नहि।
(त्त्) देव

ठ्ठ) चारि वेद चौद्ध शास्त्रो कृष्णके कहय।
कृष्णरे से अंश सवे जगत निश्चय।। (76)
(श्रीमद्भागवतः द्वितीय स्कन्ध, ब्राहृा-नारद संवाद)
चार वेद चौदह शास्त्र कहते हैं कृष्ण भक्ति,
सारा जग है कृष्ण का अंश, यह हैं निश्चित।(76)