महापुरुष श्रीमन्त शंकरदेव जी
श्रीमन्त शंकरदेव जी को बारे में कुछ लिखाना मेरे जैसे व्यक्ति को अपनी छोटी बुद्धिरुपी नाव से उनके गुणों के अगाध सागर को पार करने की कोशिश होगी। जिन्होंने इस धराधाम पर अवतरित हो कर असम प्रान्त और भारत को जन मानस को कृतार्थ कियाः
कुलं पवित्रं जननी कृतार्था।
वसुन्धरा पुण्यवती च येन।।
जिस ज्ञान द्वारा वेद व्यास ने अठारह पुराण की रचना करके लोगों और जनमानस को ज्ञान प्रदान किया और उसका सारांश और मूल भाव को दो बातों में व्यक्त किया जिसमें परोपरकार को पुण्य और दुसरे को कष्ट दोना पाप कहा है।
अष्टादश पुराणेषु वचनं द्वयम्।
परोपकाराय पुण्याय परपीड़नम्।।
फिर भी जनमानस द्वारा पाप-पुण्य के दुस्तर कर्मो को प्रति-पादित करना गृहस्थ जीवन द्वारा बहुत ही कठिन था, जिसे श्रीमन्त शंकरदेवजी ने बहुत ही सरल और केवल एक ही बात मोक्ष के द्वार को खोल कर दिखा दिया। जो है-
एक शरण हरि नाम। – गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण का स्वयं अपने मुख से ही नाम कीर्तन का महत्व बताना –
सर्वधर्मान्परित्यज्य मानेकं शरणं ब्राज।
अहंत्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षायिष्यामि मा शुचः।।
अर्थात, सम्पूर्ण धर्मो एवं कर्तव्य कर्मो को त्याग कर तू केवल और केवल मुझ ही परमेश्वर की शरण में आ जा, मैं तुझे तुम्हारे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दुँगा। भागवत महापुराण में भी नाम कीर्तन की विशेषता पुरान के अन्तिम श्लोकों में देखा जा सकता है।
नाम संकीर्तनम् यस्य सर्वपाप प्रणाशनम्।
प्रणामों दुख शमनं त्वं नमामि हरि परम्।।
श्रीमन्त शंकर देवजी का जन्म और कार्यकाल जिस समय हुआ था उस समय असम प्रान्त की परिस्थिति बहुत ही बिषम थी, फिर भी उन्होने उसी परिस्थिति में जाति भेद, धर्म भेद, हिंसा, अशिक्षा और गरीबी को दृष्टि में रखते हुए तथा जनमानस की उसी जटिलताओं के बीच सबसें सामंजस्य के साथ वँहा की जमीनी परिस्थिति को उत्कृष्ट किया और विभिन्नता को एक रुपता में पिरोकर (गूँथकर) वहाँ की जनता में जागरुकता, ज्ञान, व्यवसाय और समाज के करणीय और अकरणीय कर्तव्यों को अपनी रचना, बरगीत, नाटक, मंचन, भाषा एवं विशुद्ध प्रेम से सम्पूर्ण जनमानस को आलोकित एवं आह्लादित किया। किन्तु मेरे अपने स्वयं के विचार कह रहे हैं कि विशेषकर असम के प्रबुद्ध लेखक वर्ग, विचारक एवं शोधकर्ता तथा शासन एवं शासकीय व्यवस्था ने श्रीमन्त शंकरदेवजी को वह स्थान भारत में नही दिला पाया जिसके लिए वे सर्वथा योग्य थे। पता नही मेरी यह उपालम्भ शायद कुछ लोगों को कष्टप्रद लगे फिर भी मैं अपनी दुर्विनीत बुद्धि द्वारा यह उलाहना दे दी दिया। क्योंकि जो प्रसार उनके बारे में सम्पूर्ण भारत में होना चाहिए था वह प्रसार नहीं हो पाया और इसका दोष शासन से अधिक मुझे वहाँ के प्रबुद्ध वर्गपर ही प्रतीत हो रहा है।
श्रीमन्त शंकरदेव रुपी कल्पवृक्ष धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों फलों को विशेष कर असम के लोगो को दिया और इन फलों के रुप में भारत के अन्य भागो के लोगो को भी मिला, किन्तु यह बात खटकती ही रहेगी कि हम वह नहीं किए जो हमें श्रीमन्तजी के लिए करना था। मैं डा0 पराग भूञाँ, पशु चिकित्सक सेप्पा के अथक प्रयास और इनके व्यवसाय के प्रतिकूल होने पर भी अपने को बहुत ही कृतकृत मानता हुँ जो श्रीमन्त शंकरदेवजी के ज्ञान रुपी अमूल्य भोतियों को पिरोने का प्रयास कर रहे है। मैं इनके प्रयास और लगन की उठकंठा के सफलता की कामना करता हूँ। जिन्होने मुझे श्रीमन्त शंकरदेवजी के बारे में जानने के लिए प्रेरित किया और इस नराधम को भी अमृततुल्य ज्ञानामृट का रसास्वादन कराकर कृतार्थ किया। बुद्धि के आठ गुणों मे मैं इनमें बहुत कुछ को पाता हूँ।
शुश्रुषा श्रवणं ग्रहणं धाराणं तथा।
उहा पोहोर्थ विज्ञानं तत्वज्ञानं च धी गुणाः।।
