ड) धर्मिष्ठ बलिष्ठ धनुद्र्धर किछु नुइ।
योहि करे ईश्वरे सेहिसे सत्य हुए।।
ईश्वर चेष्टाक जाने कमन महन्ते।
ब्राहृा हरो मोह याय याक बिचारन्तो।। (143)
चिनाइबे लागिला भीष्मे मेलिया आंगुलि।
एहेन्ते ईश्वर कृष्ण कालो आंक बुलि।।
सम्प्रति आछन्त हुया देवकी तनय।
आन्ते हुई जगतरे सृष्टि स्थिति लय। (144)
(श्रीश्रीमद्भागवतः प्रथम स्कन्ध)
धर्मिष्ठ बलिष्ठ धनुद्र्धर यह सब कुछभी नही हैं,
जी करता है ईश्वर, वही सत्य हैं।
ईश्वर के चेष्टा को जानते हैं कौन सन्त….
बहृा शिव जी भी मोहित है जिनकी खोज में। (143)
परिचय करवाने लगे भीष्म उंगली के इशारें सेः
यही हैं ईश्वर कृष्ण और येही हैं कालचक्र।
प्रस्तुत अभी हैं देवकी तनय के रुप में,
जगत की होती सृष्टि स्थिति लय जिनमें।।(144)
(त्त्त्) नाम
ठ्ठ)
यितो जने करे कृष्णर श्रवण
कृष्णर करि कीर्तन।
ताहार चित्तत होवन्त प्रवेश
भगवन्त नारायण।।(521)
(श्रीमद्भागवतः द्वादश स्कन्ध, भागवत तात्पर्य)
जो करते हैं कृष्ण चरित्र श्रवण
और कृष्ण चरित्र कीर्तन,
उनके चित्त में होता हैं प्रवेश
भगवन्त नारायण। (521)
