(त्ध्) भक्त
ठ्ठ) देवतो तीर्थतो करि भकतेसे बर।
भकतक भजिले गुचय कर्मजर।। (181)
(श्रीमद्भागवतः एकादश स्कन्ध, उद्धव संवाद)
मानव हैं श्रेष्ठ देवता और तीर्थ से,
दुर होते हैं अन्धविश्वास मानव सेवा के जरिये। (181)
ड) मइ एरे भकतर नाहिके अन्तर।
मोर संग एरे सरि संगति सन्तर।। (182)
(श्रीमद्भागवतः एकादश स्कन्ध, उद्धव संवाद)
मुझमे (कृष्ण) और भक्त में नही हैं अन्तर,
मेरा-संग और साधु-संग है एक निरन्तर। (182)
चतुर्थ अध्याय
ॠ) भक्ति योग
1) श्रवण कीर्तन
ठ्ठ)
श्रवण कीर्तन स्मरण विष्णुर
अर्चन पद सेवन।
दास्य सखित्व वन्दन विष्णुत
करिब देहा अर्पण।।
नवबिध भक्ति विष्णुत आचरै
सेहिसे पाठ उत्तम।(340) (कीर्तन घोषा, प्रह्लाद चरित)
श्रवण कीर्तन स्मरण विष्णुका
अर्चन पद सेवन।
दास्य सखित्व बन्दन विष्णु में
करना हैं देह अर्पण।।
(नवविध) भक्ति विष्णु में करके आचरण
यही हैं पाठ उत्तम।। (340)
ड) यद्यपि भकति नवबिध माधवर।
श्रवण कीर्तन तातो महा श्रेष्टतर।। (34) (श्रीमद्भागवतः प्रथम स्कन्ध)
यद्यपि कृष्ण भक्ति हैं नवधा,
श्रवण कीर्तन हैं सर्वोत्तम।(34)
