मनुष्य लोकत एहिमाने मात्र
परम धर्म सम्प्रति।
श्रवण कीर्तन करिया नामक
कृष्णत करा भकति।। (351)
इहार प्रमाण नुसुधिबि दूत
एहि सत्य वेद वाणी।
यातना तापत मरै प्राणी यत
एहितो धर्म नजानि।। (352) (श्रीमद्भागवतः प्रथम स्कन्ध)
मनुस्य लोकमें यही है मात्र
परम धर्म सम्प्रति,
श्रवण कीर्तन करके हरि नाम
केवल कृष्ण में करो भक्ति। (351)
इसका प्रमाण पुछो मत हे यमदूत
येही हैं सत्य वेद वाणी,
दुख-यातना में मरते मनुष्य गण
नजान के धर्म यही। (352)

2) भक्ति उत्तम

ठ्ठ)
ज्ञानर पथत नाहिके सहाय
कम्र्मत बिध्निर भय।
भकति पथत ईश्वर रक्षक
जानिबा राजा निश्चय।।(78)
(श्रीमद्भागवतः षष्ठ स्कन्ध, अजामिल उपाख्यान)
ज्ञान योग के पथ में नही मिलती सहाय
कर्मकाण्ड में हैं विघ्न का भय,
भक्ति योग के पथ में ईश्वर हैं रक्षाकारी
जानो हे राजन ही निश्चय। (78)
ड)
ज्ञानी कम्र्मी जने नजाने नामक
भकतर नव निधि।
परम ईश्वर आछन्तोक कृष्ण
नामते समस्ते सिद्धि।। (291)
(श्रीमद्भागवतः षष्ट स्कन्ध, अजामिल उपाख्यान)
भक्तो के नव निधि हरि कीर्तन के महिमाको
जानते नही ज्ञान योगी, कर्मकाण्र्डी,
परम इश्वर कृष्ण ही हैं (और)
कृष्ण नाम में हैं सर्व सिद्धि। (291)