ड़)
मञि बिने वेदे किछो आन नवखाने।
समस्त वेदर तत्व अर्थ एहि माने।।
मनुत प्रथमे ब्राहृा कहिला हरिषि।
पाचे जानिलन्त वेद सवे सप्तऋषि।।(148)
तात पाचे पाइले सुरासुर सिद्ध नाग।
अनन्तरे वेदक मनुस्ये पाइले लाग।।
यार येन मति करै वेदक व्याख्यान।
निज अर्थ भकतिक तेजि बुजै आन।। (149)
केहो बोले वेद कवै यज्ञ ब्रात दाने।
केहो बोले क्षुद्र देव पूजा तीर्थ स्नाने।।
कोहो बोले वेदे कवै ज्ञानतेसे गति।
गुणर इच्छाये फ्राुजे यार येन मति।। (150)
कतो मन्दमति शास्त्र नकरे फ्रिाचार।
करै कुलधर्म पुब्र्बा पुरुष आचार।।
ताको एरि लवै कतो पाषण्डर मति।
याइ मोक नपाया अधम अधोगति।। (151)
नछारै कर्मीक शोके दुखे राति दिने।
ज्ञानतो नाहिकै गति भकति बिहीने।।
आने नजानय इटो वेदर बिचार।
एतेके भकति पन्थ सन्मत आहृार।।(152)
(श्रीमद्भागवतः एकादश स्कन्ध, श्रीकृष्णर बैकुन्ठ प्रयाण)
मेरे अलवा वेद में कुछ होते नही अन्य प्रशंसा,
यह ही हैं मूल तत्व-अर्थ वेदों का।
मनु को बोले थे ब्राहृाजी पहले परम हर्षित होकर,
उसके वाद वेदों का ज्ञान हुवा सप्तऋषिओं का। (148)
उसके वाद मिला ज्ञान वेर्दो का देर्वो और असुरों को,
अन्त मे मिला ज्ञान वेदों का मनुस्य को।