अपने बुद्धि के अनुसार करते है मनुस्य वेदो का व्याख्यान,
वेदो का मूल तत्व भक्ति-योग छोड़के समझ लेते अन्य व्याख्यान। (149)
कोइ बोलते यज्ञ ब्रात दान हैं वेद वाणी,
कोइ बोलते श्रुद्र देव पूजा और तीर्थ स्नान हैं वेद वाणी।
कोइ बोलत ज्ञानयोग हैं उत्तम और वेद वाणी,
समझते हैं मनुस्यों वेदो को, गुण और बुद्धि के अनुसार। (150)
बुद्धि भ्रष्ठ मनुस्य करते नही शास्त्र अध्ययन,
करते हैं मात्र परम्पाराओं का पालन।
उसको भी छोड़ के लेते हैं लोग पाखण्डों का बुद्धि,
नही पाते ईश्वर तत्व, और जाते हैं अधोगति।(151)
छोड़ते नही कर्मकाण्डी को शोक-दुख रात दिन,
गति मिलेंगे नही ज्ञान योग मे, भक्ति के बिन।
जानते नही कोइभी यह रहस्य वेदो का,
अतएव वेदों का भक्ति पन्थमें हैं, सहमत मेरा।। (152)
3) मुक्ति नही, भक्ति हैं सही
ठ्ठ)
मुकुतित करि जेन भकति गरिष्ठ अति
कहो शुणा सावधान मने।
सायुज्य मोक्षके मोर नबान्छय कदाचित
आहृार एकान्त भक्तगणे।।(481)
(संसकृत भक्ति रत्नाकर का अनुवादः रत्नाकर भास्य)
मुक्ति से भी गरिष्ठ हैं भक्ति
कहता हुँ मैं, सुनो सावधान होकर,
मेरे एकान्त भक्तगण चाहते नही कभी
मोक्ष, बिन पूर्वजन्म का।। (481)
