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तुमिसे केवले सत्य मिछा सवे आन।
जानि ज्ञानीगणे करे ह्मदयत ध्यान।।
नमागोहो सुख भोग नलागे मुकुति।
तोहृार चरने मात्र थाकोक भकति।। (522)
(कीर्तन घोषाः हरमोहन, शिवजी का कृष्ण के प्रति मिनति)
तुम ही केवल सत्य, असत्य हैं अन्य सब,
जानके ज्ञानीगण करते हैं तुमको ह्मदय में ध्यान।
चाहता नही मैं सुख भोग, चाहता नही मुक्ति,
तुम्हारे चरण में मात्र चाहता हुँ भक्ति। (522)
4) गृहवासी होकर हरि दर्शन

कृष्ण कथा शुणा सर्वजने।
उद्धारिबे कृष्णर कीर्तने।।
मोक्ष पाइबा गुहबासे थाकि।
जानि हरि हरि बोला डाकि।। (1854)
(कीर्तन घोषाः श्रीकृष्णर फ्रौकुन्ठ प्रयाण)
कृष्ण कथा सुनो सर्वजन,
करेंगे उद्धार मनुष्योको कृष्ण का कीर्तन।
मिलेगा मोक्ष होके गृहवासी,
यह जानके बोलो हरि हरि। (1854)