गृहते थाकिया हरिक स्मरिया
मोक्ष साधा हरिनामे।।(214)
(कीर्तन घोषाः अजामिल उप्याख्यान)
गृहवासी होके हरि स्मरण करके
प्राप्त करलो मोक्ष, हरिनाम से।। (214)
5) प्रेम भक्ति
ठ्ठ)
प्रेम भकतिर चिह्न शुणियो उद्धव।
हरि हरि बोलन्ते लोतक चार रुावे।।
मोर कथा शुणन्ते शरीर रोमांचित।
जाना तार परम पवित्र भेल चित्व। (166)
प्रेमे द्रवै चित आति गदगद वाणी।
कतो हासै कतो कान्दै प्रिय मानि।।
लाज एरि गावै गुण नाचे आनन्दते।
जगत पवित्र करै सेहिसे भक्ते।।(167)
(श्रीमद्भागवतः एकादश स्कन्ध, उद्धव संवाद)
प्रेम भक्ति के चिह्न सुने, हे उद्धव,
हरि हरि बोलते जिसका झरता हैं आँसु,
और मेरे कथा सुनते ही होता है शरीर रोमांचित,
जानलो उसका परम पवित्र हुवा चित्त। (166)
चित्त होते हैं प्रेम द्रवित, और वाणी गंभीर,
कभी हंसता कभी रोता, मानके मुझको प्रियवर।
छोड़के लाज नाचते आनन्द में, और गाते मेरा गुण,
करते है जगत पवित्र वही भक्तगण। (167)
6) विशुद्ध भक्ति
ठ्ठ)
आत्मज्ञानी गणो होवै मायाये मोहित।
जानि मोर सेवात एकान्ते दिया चित्त।।
नकरिवा सेवा सखि आन देवतार।
नुहि येन आह्रार भकति व्यभिचार।। (251)
(श्रीमद्भागवतः एकादश स्कन्ध, उद्धव संवाद)
आत्मज्ञानी जन भी होते हैं माया से मोहित,
यह जानकर मूझ में ही दो एकान्त चित्त।
मत करना सेवा सखा अन्य देवताऔं की,
होना नही चाहिए मेरी भक्ति का व्यभिचार।। (251)