7) निर्गुण भक्ति
यज्ञ दान ब्रात सवे गुणमय
भकति मोर निर्गुण।
जानिया आह्राक स्मरियो सदाये
सुह्मद सखि अर्जुन।।(301) (भक्ति प्रदीप)
यज्ञ दान ब्रात सब हैं गुणमय
परन्तु मेरा भक्ति निर्गुण,
यह जानके मुझको करो सदा स्मरण
हे सुह्मद सख्या अर्जुन। (301)
पंचम अध्या
(ॠ) ज्ञान योग
ठ्ठ)
भक्ति हीन ज्ञान योग यि जने आचरे।
नाहि एको फलमात्र दुःख करि मरे।।
स्वर्गको नपावे मात्र ज्ञान योग बले।
येन काष्ठ पतानक बाहाने निस्फले।।
मत्य आशा करे येन बृष्टिर जलत।
शुधा ज्ञान-योग जाना सखि सेहि मत।।(19-20)
(भक्ति प्रदीपः भगवन्त कृष्ण का अर्जुन के प्रति उक्ति)
जो करते आचरण भक्तिहीन ज्ञान योग,
नहि कोइ फल, ओर मिलता हैं मात्र दुःख भोग।
मिलत नहि स्वर्ग मात्र ज्ञान योग से,
तलाशते हैं जेसे चावल छिलका से।
जैसे बृष्टि जलमें करते मछली की आशा,
मात्र ज्ञान योग हैं उसी तरह, जानलो सखा। (19-20)
