ड)
ज्ञाने गति कवै वेद लवा तार परिच्छेद
आछै ज्ञान भकतिर माजे।
भकति करन्ते जाना आपुनि उपजै ज्ञान
योग चिन्ति मरै मिछा काजे।। (200)
(श्रीमद्भागवतः एकादश स्कन्ध, उद्धव संवाद)
वेद कहते है ज्ञान में गति लेलो उसका व्याख्यानः
ज्ञान है भक्ति के भितर,
जानलो, करते हुवे भक्ति सेच्छासे जनम लेते ज्ञान
योग चिन्तन में दुःख भोगते हैं नर।।(200)
ड़)
मुकुति रसको रुावै तोहृार भकति।
तांक एरि ज्ञानपथे यिटो करै रति।।
क्लेश मात्र पावै सितो निस्फल प्रयासे।
बाहाने पतान येन तन्डुलक आशे।। (745)
(कीत्र्तन घोषाः शिशु लीला, बहृाजी ने श्रीकृष्ण को स्तुति किया)
कृष्ण भक्ति (तुम्हारा भक्ति) मुक्ति रस को भी करता हैं संपृक्तः
अतएव छोड़ के भक्ति पंथ, होता हैं जो ज्ञान पंथ में रत,
निस्फल हैं प्रयास उनका और होता हैं प्राप्त क्लेश मात्र,
जैसे मशीन में डालते हैं छिलके, चावल की आशा में। (745)
षष्ठ अध्याय
(ॠ) कम्र्म योग
1) मूर्ति पूजन निषेध
ठ्ठ) तीर्थ बुलि करै जलत शुद्धि।
प्रतिमात करै देवता बुद्धि।।
वेष्णवत नाइ इसव मति।
गरुतो अधम कृष्ण बदति।। (132)
(कीर्तन घोषाः पाषण्ड मद्र्दन)
तीर्थ मानके जल से करते शुद्धि करण,
मानते प्रतिमा को देवता जानकर,
उनका नही मति वैष्णव में,
कृष्ण कहते, वह लोग हैं अधम पशु समान। (132)
ड)
अन्य देवी देव नकरिवा सेव
नखाइबा प्रसाद तार।
मूर्तिको नचाइवा गृहो नपशिबा
भक्ति हैबो व्यभिचार।(124)
(श्रीमद्भागवतः द्वितीय स्कन्ध)
अन्य देवी देव ना करियो सेवा
खाइयोना प्रसाद अनमें समर्पित,
ना करियो मूर्ति दर्शण ना करियो प्रवेश मूर्ति-गृह
करने से एैसा, भक्ति होगा व्याभिचार। (124)
