सुनने की इच्छा, सुनना, ग्रहण करना, स्मरण रखना, उहा (तर्क-वितर्क) अपोह (सिद्धान्त का निश्चय) अर्थज्ञान होना तथा तत्व को समज्ञना ये बुद्धि के आठ गुण नीति विशारदों ने बताए हैं।
श्रीमन्त शंकरदेव जी ने विकट परिस्थिति में भी जो ज्ञान ज्योति असम में फैलाई थी उसी ज्ञान की दीप से दीप जलाकर महात्मा गाँधी ने सम्पूर्ण भारत में वही प्रकाश फैलाने का प्रयास किया और विश्वनेता के रुप में अग्रगण्य हो गये जिलका फ्राहुत कुछ श्रेय तत्कालिक लेखक, कवि, और शोधकर्ता के साथ साथ भारत के शासन तन्त्र की जाता हैं।
श्रीमन्त शंकरदेव द्वारा स्थापित नामघर, कला-संस्कृति, सामाजिक परिवेश और लोगों द्वारा आतिथ्य-सत्कार आदि गुणों का दर्शन आज भी असम के ग्रामीण अंचल में दृष्य हो जाता है, नही तो पाश्चात्य अंधानुकरण हमारे संस्कृति की नाश के लिए यमपाश की तरह पीछे पड़ी हैं। इस विषम घड़ी में हमें अपनी संस्कृति की रङा, अपने आत्म सम्मान की रक्षा से भी बढ़कर करनी चाहिए, जो मात्र शंकरी संस्कृति द्वारा ही संभव है।
विश्व के अन्य महापुरुषों नें सिर्फ धर्म दर्शन के क्षेत्र में ही योगदान दिया है, अर्थात वें लोग सिर्फ धर्मगुरु थे। लेकिन महापुरुष श्रीमंत शंकरदेवजी एकशरण हरि नाम धर्म और भारतीय संस्कृति के भी गुरु हैं। शंकरदेवजी की रचना समूह विश्लेषण करने से यह स्पष्ट रुप से प्रकट होता है की वे शास्त्र सम्मत रुप से ही जगत गुरु हैं।
अध्यापक श्री शिवचन्द्र प्रकाश मिश्र,
स्नातकोत्तर, संस्कृत साहित्य
संपूर्णानन्द संस्कृत विश्व विद्यालय
वाराणसी, उत्तर प्रदेश
राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, सेप्पा।
अरुणाचल प्रदेश (भारत)।
श्रीमन्त शंकरदेव
श्रीमन्त शंकरदेव एक एैसे अद्वितीय व्यक्तित्व जो हर क्षेत्र में निपूण व कौशलता का ज्ञात कराते हैं। धार्मिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, सामाजिक क्षेत्र में उन्होने अपना बहुमूल्य योगदान दिया है। इस पुस्तक में लेखक ने गुरुजना के योगदान का पूरा विवरण दिया है।
आच हम सभी के जेहन में यह सवाल हे कि एैसे अद्वितीय व्यक्तित्व जिन्होने हर क्षेत्र में सबसे पहले अपना योगदान दिया था, इतने वर्ष लुप्त क्यो रहे? क्यो वे सिर्फ असमीया समाज में ही जाने गए जबकि उनका योगदान तो पुरे भारतवर्ष, पुरे विश्व ब्राहृाण्ड के लिए था। किन्तु उनके फ्रााद जितने भी महान पुरुष हुए जैसे स्वामी विवेकानन्द, परमहंस आदि सभी विश्व विख्यात है जबकि उनका योगदान केवल एक क्षेत्र मे ही सिमीत रहा हैं (धर्म के क्षेत्र में)। शायद इसका कारण प्रचार के क्षेत्र में कुछ त्तुटियाँ।
आज जो शंकरदेव संघ कर रहे हैं वह प्रशांसनिय है पर यह कार्य बहुत पहले आरम्भ होता तो शायद आज भारत तथा विश्व के हर कोने के बच्छे-बच्छे के जबान पर श्रीमन्त शंकरदेव जी का नाम होता।
मेरे विचार से अगर हम नीचे दिए गए बातो पर थोड़ा विचार करे व अमल करे तो शायद शंकरदेव जी के आदर्शो के प्रचार में रफतार बड़ सकती हैं, जैसे –
1) अगर शंकरदेव जी और उनके आदर्श को कमिक्स (जी बच्छो मे काफी लोकप्रिय है) का रुप देकर बच्छो में प्रचार करे। क्योकि हम सभी जानते है आज के बच्छे कल का भबिष्य हैं।
2) प्रचार का माध्यम हर भाषा में हो तो ठीक है। जितने भी पुस्तके है भागवत से लेकर कीर्तन-घोषा, नाम-घोषा आदि सभी हिन्दी, अंग्रेजी और अन्य प्रादेशिक भाषा में होना चाहिए। अंकीया नाट, रास-लीला आदि भी हिन्दी, अंग्रेजी और अन्य प्रादेशिक भाषा में दिखाया जाए।
3) आजकल जितने भी शंकरदेव विद्यालय खोले गए है उनका साँचा या अनुकरण क्एच्क का हो तो भविष्य में हम अपने राज्य (असम) के बाहर भी शंकरदेव विद्यालय खोल सकते हैं। क्एच्क के अनुकरण में विद्यालय खोले जाने पर माध्यम तो निश्चित ही अंग्रेजी होगा पर अन्य विषयों के साथ शंकरी संस्कृतिका भी विषय होना चाहिए, जिसमे अंक न देकर ग्रेड (वर्ग) दिया जाए और हफ्ते में एक दिन इसको पड़ाया जाए। और भारत के कोनो कोने के विभिन्न प्रांत के लोगो का पीड़ी दर पीड़ी (क्रड्ढदड्ढद्धठ्ठद्यत्दृद द्यदृ क्रड्ढदड्ढद्धठ्ठद्यत्दृद) शंकरी संस्कृति से जड़ित होने के पुरी संभावना हैं।
