2) बलि बिाधान निषेध

ठ्ठ) घर पोषा पशु यिटो करे बलि दान।
परम अज्ञानी सितो राक्षस समान।। (58)
(श्रीमद्भागवतः षष्ठ स्कन्ध, अजामिल उपाख्यान)
पालतु पशु को जो करते हैं बलिदान,
परम अज्ञानी वे हैं राक्षस समान। (58)

ड) नमारिबे पशुक एरिबे मांस आशा।
देवको अद्देशि पशु मकरिबे हिंसा।। (351)
(श्रीमद्भागवतः एकादश स्कन्ध, निमि नव सिद्ध संबाद)
मत करो पशु वध और त्याग दो मांस की इच्छा,
देवताओं के नाम में न करना पशु हिंसा।। (351)

ड़) नारद बदति शुणा महामुनि ब्यास।
तुमिसे करिला सवे जगतके नाश।।
निरन्तरे पशुर लोवाइला तुमि प्राण।
नाहि मन्द कर्म आर इहार समान।। (32)
आकस्मिके लोकक कराइला हिंसा धर्म।
नुबुजिला तुमियो बेदर तत्व मर्म।।
गरिहित कर्मको कहिला धर्म बुलि।
तोहृार बचने लोक नाशिल समूलि।।(33)
स्वभावे लम्पत बिषयत अनुराग।
स्वर्ग पाइबो बुलि रंगे कातै हंस छाग।।
करे नाना हिंसा धर्म नाना देव पूजै।
पुण्यक्षय भैले दुनाइ नरकत मजै।। (34)
(श्रीमद्भागवतः प्रथम स्कन्ध, व्यास नारद संबाद)
नारद मुनि, कहते हैं सुनो हे महामुनि व्यास,
तुमने ही किया समस्त जगत का नाश।
निरन्तर तुमने करवाए नाश पशुओं के प्राण,
हैं नही कोइ पाप कर्म और इसके समान।(32)