हठात ही लोगों को करवाया हिंसा धर्म,
तुम भी नही समझ पाये वेदों का तत्व मर्म।
निन्दनीय कर्म को तुमने दिया धर्म का नाम,
तुम्हारे वचन से लोगों का हुआ सर्वनाश। (33)
हैं मनुष्य स्वभाव से लम्पट और विषय सुख में अनुरागी,
स्वर्ग की आश में हर्षित हो, करते हैं हत्या पशु पक्षी।
करते पालन हिंसा धर्म और पूजन भिन्न देवों को,
पुण्यक्षय के बाद है होता, नरक दर्शन पुनः मनुष्यों को। (34)
3) दक्षिणा
ठ्ठ) ईश्वर ज्ञानक यिटो देइ उपदेश।
ताकेसे दक्षिणा बुलि नाहिके सन्देश।। (220)
(श्रीमद्भागवतः एकादश स्कन्ध, उद्धव संबाद)
ईश्वर ज्ञान का जो देते हैं उपदेश,
कहते हैं उसको दक्षिणा, नही इस में सन्देह। (220)
4) अज्ञानी के लिए कम्र्मकाण्ड
ठ्ठ) राखिलन्त कम्र्मकाण्ड अज्ञानीर पदे।
कम्र्मीक नेड़िब घोर परम आपदे।।
उपजि मरिबे महा भून्ञिया निकार।
कोटि कोटि कल्पे नाहि कम्र्मीर निस्तार।। (388)
(श्रीमद्भागवतः षष्ठ स्कन्ध, अजामिल उपाख्यान)
रखा गया कम्र्मकाण्ड अज्ञआनीओं के लिये,
कम्र्मकाण्डी को छोड़ती नही मुसीबते।
मिलेगा उनको यातना इसी जनम में,
कम्र्मकाण्डी का निस्तार नहीं करोड़ों जनम में। (388)
