5) प्रायश्चित (चित्तशुद्धि)
ठ्ठ) तप जप तीर्थ ब्रात बिधिर किंकर।
नामर कीर्तन इटो बिधिर ईश्वर।।
नाहि काल नियम नामत एको बिधि।
येइ सेइ मते लैले नामे करै शुद्धि।। (182)
(श्रीमद्भागवतः षष्ठ स्कन्ध, अजामिल उपाख्यान, नाम महिमा)
तप जप नीर्थ व्रत हैं विधि का किंकर,
हरि नाम कीर्तन हैं विधि का ईश्वर।
हरि नाम कीर्तन में नही कठोर नियम या काल प्रतिवन्ध,
हर दंग से लेने पर, हरिनाम करता हैं शुद्धिकरण। (182)
ड)
नामर महिमा नजानि ऋषिये
आन प्रायश्चित फ्रिाहै।
मृत संजीवनी नजानिया वैद्ये
आन औषधक दियै।। (202)
(श्रीमद्भागवतः षष्ट स्कन्ध, अजामिल उपाख्यान)
नाम की महिमा अजानकर ऋषि
देते हैं अन्य हल प्रायश्चित की,
जैसे नजान के संजीवन ओषधि
वेद्य देते हैं अन्य प्रकार की। (202)
