6) सर्वसिद्धि दाता कृष्ण-नाम
ठ्ठ)
भकतिसि नवनिधि करिबेक सर्वसिद्धि
आत अनुपात्र शंका नाई।
जन्म चिन्तामणि पाई आर आयु बृथा जाय
कृष्णक नेरिबा सर्बदाय।। (173)
(श्रीमद्भागवतः दशम स्कन्ध, कुरुक्षेत्र यात्रा)
भक्तिही है नवनिधि करेगी यह सर्बसिद्धि
इसमें नहीं अणुमात्र शंका,
प्राप्त किया मनुष्य जन्म आयु क्षय हो रहा हैं पल पल
करो सुमिरण कृष्ण नाम सर्वदा। (173)

सप्तम अध्याय
(ॠ) अस्पृश्यता
ठ्ठ) चण्डाले करिछेहरि कीर्तन।
बुलिया निन्दैयिटो अज्ञजन।।
ताक सम्भाषन यिजने करो।
आजन्मर पुण्य तेखने हरै।। (88) (कीर्तन घोषाः पाषण्ड मर्दन)

चाण्डाल ने किया हैं हरि कीर्तन,
यह कह कर करते है निन्दा जो अज्ञानीजन,
और उस अज्ञानीजन को जो करते हैं प्रशंसा,
आजन्म का पुष्य क्षय होता हैं उस प्रशंसक का।। (88)