ड) सिटी चण्डालक गरिष्ठ मानि।
यार जिह्बाग्रे थाके हरि वाणी।।
समस्ते तीर्थते करिल स्नान।
करिल सव तप होम दान।। (111) (कीर्तन घोषा)

उस चाण्डाल को ही वरिष्ठ मानो, जिसके जुबान में रहते हैं हरि नाम, समझो हो गया उनका समस्त तीर्थो में स्नान, और कर लिये वे समस्त तप होम दान।। (111)

ड़) सेहिसे कुलीन वेदक बुजै।
याहार मुखत हरि नाम सिजै।।
परम तत्व जानि देवहूति।
तृतीय स्कन्धत करिला स्तुति।। (112) (कीर्तन घोषाः पाषण्ड मर्दन)

उन्हीं को कहते है कुलीन और वेदज्ञ, जिसके कण्ठ से प्रकाश होता है हरिनाम।। यह परम तत्व जानते हुए देवहूति ने की थी स्तुति, देखो भागवत के तृतीय स्कन्ध में।। (112)

कृष्णर भकति आति नचावै आचार जाति
जगतरे महा हितकर। (2452)
(श्रीमद्भागवतः दशम स्कन्ध, आदि भाग)

जगत की महा हितकारी कृष्ण भक्ति के लिए
नहीं हे आचार जात-पात के भेद। (2452)
अष्टम अध्याय
(ॠ) नारीवाद
(1) नारी की गुण
ठ्ठ) कर्म समयत तोके मंत्री बुलि लेखि।
रंगर बेलात येन तइ प्राण सखी।।
स्नेहर प्रस्तावे तइ मातृ येन ठान।
शयण बेलात तइ दासीर समान।। (432) (हरिशचन्द्र उपाख्यान)