कार्य साधन के समय लगती हो तुम मंत्री जैसी, मनोरंजन के समय रहती हो प्राण सखी जैसी। स्नेह दान के समय में तुम हो मातृ समान, और शयन काल में, हो तुम दासी समान। (432)
(2) सर्व-शिक्षा
ठ्ठ)
काक बुलि हरि कथा हरिर कीर्तन किबा
यिटी सवे एकोवे नजाने।
स्त्री शूद्र अन्यजाति ताको शिक्षा दिबा माति
धरिवे सिसबे अहोप्राणे।। (332)
(श्रीमद्भागवतः एकादश स्कन्ध, निमि-नवसिद्ध संवाद)
किसे कहते हैं हरि कथा या हरि कीर्तन
जिसके के विषय में सब हैं अंजान,
स्त्री शूद्र अंत्यजाति को, दो सर्व-शिक्षा करके आमंत्रण
करेंगे वे दिलो-जान से ग्रहण। (332)
ड)
स्त्री शूद्रो करै यदि आहृात भकति।
ताहात कहिबा इटो ज्ञान महामति।।(1826)
(कीर्तन घोषाः श्रीकृष्णर बैकुन्ठ प्रयान)
करते है यदि स्त्री शूद्रों मुझ में भक्ति,
उनको भी प्रदान करना यह ज्ञान, हे महामति। (1826)
