(3) नारी स्वाधीनता के प्रति सम्मान प्रदर्शन
ठ्ठ)
महा शोके कोपे आति कम्पमान काय।
जाज्वल्य समान अगनिर शिखा प्राय।।
अंतर्गत रामर मिलिल महा भय।
देखि समज्यार मैल परम विष्मय।।
कोपे अपमाने अति चिन्त नुहि थिर।
हियात पशिल शाल नोह्लाइ गोसानीर।।
बुलिबे लागिल दूनाइ मनत आसुख।
आउरइटो स्वामी राघवरनचाओ मुख।।
आउप येन नुशुणो- रामर इटी नाउ।
फाट दिया बसुमती पाताले लुकाओ।।
(उत्तराकाण्ड रामायण)
महा शोक और क्रोध से तन हैं अति कम्पमान,
जैसे की प्रज्वलित हुई अग्नि शिखा समान।
(सीता देवी की यह रुप देख कर) श्री राम भी हो गए भय-भीत
और समाज के लोग होगये परम विस्मित।
क्रोध अपमान में चिन्त हैं अति अस्थिर,
जैसे की काँटे चुभे, देवी की दिल के भीतर।
दुःखी हो कर सीता दोवी बोलने लगीः
स्वामी राधव का चेहरा दर्शन कभी नहीं करुंगी,
और श्रीराम का नाम कभी नहीं सुनुँगी,
फाट जा है वसुमती, समा जाऊँ पाताल में।