नवम अध्याय
(ॠ) मानवतावाद
(1) साम्यवाद
ठ्ठ)
शुनियो उद्धव आरो रहस्य भकति।
करिबा अभ्यास तुमि स्थिर करि मति।।
समस्त भूतते ब्यापि आछो मइ हरि।
सवाको मानिबा तुमि बिण्णु बुद्धि करि।। (1820)
(कीर्तन घोषाः श्रीकृष्णर फ्रोकुन्ठ प्रयान)
सुनो हे उद्धव, रहस्य भक्ति की,
करना अभ्यास तुम होकर दृढ़ – मति।
मैं हरि व्याप्त हूँ समस्य जीव में,
सब को मानो तुम बिष्णुज्ञान करके। (1820)
ड)
ब्रााहृणर चन्डालर निबिचारि कुल।
दातात चोरत येन दृष्टि एकतुल।।
तीचत साधुत यार भैल एकज्ञान।
ताहाकेसे पण्डित बुलिय सर्बजन।। (1821) (कीर्तन घोषाः श्रीकृष्णर बैकुन्ठ प्रयान)
ब्रााहृण या चंडाल कुल के विचार नहीं करते जो,
रखते है सम दृष्टि दाता और चोर में जो,
हो गये है जिनका नीच या साधु में एकज्ञान,
कहते हैं पण्डित उनको ही सर्व जन। (1821)
