(2) जीव कल्याण ही हैं ईश्वर सेवा
ठ्ठ)
जगतर पुण्य माने जाना निष्टकरि।
प्राणी उपकारर अल्पकों नुहि सरि।।
हेन जानि प्राणीक अभय दिया दान।
बोला हरि हरि पाइवा बैकुंठत थान।। (हरिशचन्द्र उपाख्यान)

जानलो जग में पुण्य के संबन्ध में, प्राणी उपकार के समान कुछ भी नहीं हैं। यह जानके प्राणीओं को करो अभय दान, बोलो हरि हरि और प्राप्त हो बैकुंठ थान।

ड)
करिबा भूतक दाया सकरुण चित।
हुइबा शान्त चित्त सर्बजनन बतअसल।। (142) (भक्ति प्रदीप)

प्राणीओं से करना दया, होकर करुणामय,
होना शान्त चित्त और सबजन में प्रेममय। (142)