(3) अहिंसा
ठ्ठ)
यत देखा भूत प्राणी सवे फ्रिाष्णु देन जानि
हिंसा एड़िकरा उपकार।
बिष्णुक मनत धरा श्रवण कीर्तन करा
निस्तारिबा तेबेसे संसार।। (1341)
(श्रीमद्भागवतः अष्टम स्कन्ध, फ्रालिछलन)
जितने हैं प्राणी जानलो सब हैं विष्णु के अंश
और छोड़के हिंसा करो उपकार,
विष्णु को मनन करके करो श्रवण-कीर्तन
तभी पाओगे कृष्णमय सुख निरंतर। (1341)
ड)
घर पोषा पशु जिटो करे बलि दान।
परम अज्ञानी सिटी राक्षस समान।। (षष्ठ स्कन्ध, अजामिल उपाख्यान, नरक यातना)
पाललू पशु जो करते हैं बलि दान,
परम अज्ञानी वे हैं राक्षस समान।
ड़)
कुकुर श्रृगाल गद् र्दभरी आत्माराम।
जानिया सवाको परि करिबा प्रमाम।। (1823) (कीर्तन घोषा)
कुत्ता सियार और गधे में भी है आत्माराम,
जानके यह, सब को करों सष्टांग प्रणाम। (1823)
