अगर हम श्रीमन्त शंकरदेव जी के आदर्शो को प्रचार करने में सफल हुए तो एक समय एैसा आएगा जब समस्त भारतवर्ष या विश्व एक हो जाएगा। आपस में लोगो में भाइचारा रहेगा, अंहिसा के पथ पर सब आगे बड़ेगे और समस्त विश्व शान्ति की पथ पर होगा। न जाति-भेद, न धर्म के विषय पर लड़ाई, न कोई अंधविश्वास, बस एक शांतिप्रिय खुशहान विश्व का निर्माण होगा।
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जगत गुरु श्रीमंत शंकरदेव

सतरह पर्ष के उम्र तक –
जगत गुरु श्रीमंत शंकरदेव का आविर्भाव हुआ था 1371 शकाबद का आश्बिन मास शुक्ला दशमी तिथि में, और अंग्रेजी वर्ष का हिसाव से 1449 ॠक़् (खृष्टाव्द) में। मातृ थी सत्यसन्धा और पिता कुसुम्बार शिरोमिण भुञा। जन्मस्थान है भारतवर्ष के असम राज्य का नगाँओ जिला के अन्तर्गत बरदोवा के समीप आलिपुखुरी नामक स्थान पर।
जन्म के पश्चात श्रीमन्त शंकरदेव के सम्बन्ध में सिन्धिराम ज्योतिष सिद्धांत ने (संधरा दलै के नाम से विदित हैं) भविष्य वाणी किया था इस तरग –
भागवत ग्रंथ पदवन्धे निबन्धिब।
भाष्य पयारादि शास्त्र विस्तर करिब।।
भंगाइब पण्डितगण करि बाद बयाख्या।
भकति धर्मक आरो करिबन्त रक्षा।।
संधराये बोलो शुणा किहबो स्वरुपे।
तोमार गृहक हरि आइला निज रुपे।।
अर्थात, संधरा ने घोषणा किया की स्वयम् भगवान श्रीकृष्ण ने ही अवतार ग्रहण किया। नाम रखा श्रीशंकर। इस तरह श्रीशंकर के नाम से समाज में विदित हुए। श्रीशंकर का पन्द्रहवाँ दिवस उम्र में ही मातृ वियोग हुआ। बिन पिता-माता के शिशु श्रीशंकर को लालन-पालन किया दादी खेरसुती और घर में काम करनेवाली चंदरी ने। ग्यारह साल पर्यन्त खेल कूद में ही बीता दिया। तब दादी खेरसुती चिंता में पड़ गई और बारह साल उम्र में एक दिन श्रीशंकरको महेन्द्र कन्दलि के संस्कृत पाठशाला में नाम भर्ति कर दिया।
परम्परा मान के चलनेवाला शिक्षा गुरु महेन्द्र कन्दलि ने श्रीशंकर को परामर्श दिया इस तरह-
मास मुग आदि करि नैवेद्य सम्भार।
देवी पुजिबाक जाना लागय तोमार।।
श्रीशंकर ने तुरन्त उत्तर दिया इस तरह से –
शंकरे बेलन्त गुरु शुणिओ फ्राचन।
देवीत करिया श्रेष्ट देव नारायण।
देवी पुजिबाक हास छागल लागय।
तुलसीर पुजात कि देव तृष्ट हय….
देखिए, क्या आश्चर्य। वर्णमाला से परिचय रहित बारह साल उम्र का श्रीशंकर ने समस्त शास्त्रों का एकमात्र सत्य कृष्णस्तु भगवान स्वयम् यद तत्व सारे विश्व को विदित करवा दिया। कलियग के श्रीशंकर का यह सिद्धान्त हम सबको द्वापर युग का श्रीकृष्ण ने पोष्य पिता नंदराज को दिया हुआ सिद्धान्त का याद दिला देता हैं। नन्दराज ने जब इन्द्र पुजा करने का इच्छा प्रकट किया, तब श्रीकृष्ण ने नन्दराज को कहा था इस तरह से –
ललाटे लिखित जिटो बिहित सवारे।