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बिशेषत मनुष्यगणत यिटी नरे।
बिाष्णु बुद्धि भावे सब्र्बादाये मान्य करे।।
ईरिषा असुया तिरस्कार अहंकार।
सवे नष्ट होवै तेवे तावक्षणे तार।। (1822)
(कीर्तन घोषाः श्रीकृष्णर फ्रौकुन्ठ प्रयान)

खास तौर पर जो पुरुष मनुष्यों में, सर्बदा रखते हैं मान्य भाव विष्णु ज्ञान करके। उनका ईष्र्या बुराई निरस्कार अहंकार आदि अवगुण, सब होता है नाश उसी क्षण। (1822)

(4) मानव सेवा ही ईश्वर सेवा हैं
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देवतो तीर्थ तो करि भकतेसे बर।
भकतक मजिले गुचय कम्र्म जड़।।
करे तेवे भकति ईश्वर मोक मानि।
कहिलो तोहृात इटो सखि सत्य वाणी।।(181)
(श्रीमद्भागवत, एकादश स्कन्ध, उद्धब संवाद)
देवता और तीर्थ से भी श्रेष्ठ हैं भक्तगण,
मानव सेवा से छुट जाता है अन्धविश्वास का जड़त्व।
ऐसे ही व्यक्ति करते है भक्ति, मानके मुझको ईश्वर,
हे सखा, कह दिया मैने तुमसे यह सत्यवाणी।।(181)