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विष्णुमय देखै जिटो समस्ते जगत।
जीवन्ते मुकुत होवै अचिर कालत।।
सफल प्राणीक देखिबेक आत्मसम।
उपाय मध्यत इटो आति मुखतम।। (कीर्तनघोषाः श्रीकृष्णर बैकुन्ठ प्रयान)
जिसको दृष्टि में समस्त जगत है विष्णुमय, जीवित काल में ही हो जाते हैं वे सतचिदानन्दमय। सब प्राणी को देखो आत्मसम, उपायों में है यह अति श्रेष्ठतम।
(5) परिवेश विज्ञान
ठ्ठ)
करैपर उपकार किनो कृपामय।
पररेसे अर्थे जीवै इटो बृक्षचय।। (926)
थाकै सहि रहि महा रौद्र बृष्टि बात।
आमि सुखे बंचो रहि इहार छायात।।
पर उपकारी तरु जनम सार्थक।
सन्तर बिमुख येन नुहिके पार्थक।। (927)
बाकलि पल्लव मूल पत्र पुष्प फल।
येइ यिबा चावै पावै बृक्षत सकल।।
जीवनर सफल देहीर एहि माने।
जीवै पर उपकार करि अर्थे प्राणे।। (928)
(श्रीमद्भागवतः दशम स्कन्ध, आदि भाग)
