करतें है परोपकार कृपालु वृक्ष, दुसरो के लिए रहते है जीवित यह सब वृक्ष। (926) सहते हैं भयंकर धूप वृष्टि और पवन, इसकी छाया में रहते हैं हम, होकर सुखी आनन्द। परोपकारी वृक्ष का जनम है सार्थक, जैसे सन्त करते नहीं वंचित किसी को। (927) पेड़ की छाल पल्लव जड़ पत्ती पुष्प और फल, जो भी जो कुछ चाहते है, मिलता है सब कुछ वृक्ष में। इसीमें हैं सफलता जीवन- धारी वृक्ष का, जीवन धारण करते हैं वृक्ष, करके परोपकार, क्युकि वृक्ष करते हैं प्रदान अर्थ और प्राण। (928)
दशम अध्याय
(ॠ) राष्ट्रवाद
(1) राष्ट्रवन्दना
ठ्ठ)
नरतनु इटों भारत वरिष
कलियुग हरिनाम।
चारिर संयोग आउर कैत पाइबो
कृपा करा प्रभु राम।।
