माञि अधमर माधव फ्राांधव
बुद्धिक नकरा भ्रंश।
तोहृार चरण पंजरे पाशके
आसय मानस हंस।। (539)
तोहृारे से अंश यत जीव आमि
तुमि मोर निज स्वामी।
प्रभू दामोदर एतेक गोचर
करो तयु पावे आमि।।
तोम्हार चरण चिते नछाड़ोक
नेरिबो मुखत नाम।
हे कृष्ण प्राण दियो एहि दान
डाकि बोला राम राम।। (540)
(श्रीमद्भागवतः द्वादश स्कन्ध, ग्रन्थसमाप्ति का प्रार्थना)
यह मानव शरीर और भारतवर्ष
कलियुग और हरिनाम,
इन चारों का मिलन होंगे कहाँ बारम्बार
कृपा करों हे प्रभु राम।
हे माधव बान्धव, मुझ अधम का
न करना बुद्धि भ्रष्ट,
तुम्हारे चरण के आस पास
आया हैं मेरा यह मन-हंस। (539)
हम हैं जितने जीव हैं सब तुम्हारे ही अंश
और मेरे अपने स्वामी हो तुम,
हे प्रभू दामेदर अतएव देता हूँ अर्जी
तुम्हारे चरण में हम।
मेरे चित्त न छोड़ेंगे तुम्हारी चरण
और छोड़ेंगे नहीं हरिनाम,
हे प्राण-कृष्ण देदो यह दान
उच्च स्वर में बोलो राम राम। (540)