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कृष्णर किंकरे भणिल शंकरे
शुणियोक सर्बजन।
हेन जानि आन आल जाल एड़ि
करियो हरि कीर्तन।।
कोन दिन इटो शरीरपरय
के तिक्षणे नेय यम।
आउर कि सेन्थरे भारत भूमित
हुइबाहा मनुष् जन्म।। (213)
कोटि कोटि जन्म अंतरे जाहार
आछे महा पुण्य राशि।
सि सि कहाचित मनुष्यय होवय
भारत भुमित आसि।।
देवर दुल्र्लभ इहेन जन्मक
व्यर्थ करा कोन कामे।
गृहते थाकिया हरिक स्मरिया
मोक्ष साधा हरिनामे।। (214)
(कीर्तन घोषाः अजामिल उपाख्यान)
कृष्ण सेवक मैं शंकरदेव कहता हूँ
सुनो सफ्र्राजन,
यह जानकर छोड़के भ्रम
करो हरि कीर्तन।
कौन जाने किस दिन यह तन होगा पतन
और मुख्त होगा कब जीवात्मा।
पुनः अल्पकाल में भारत भूमि में
क्या प्राप्त करोगे मनुष्य जन्म।(213)
कोटि जन्म के पश्चात जिसका हुआ
महा पुण्य संचय,
वही प्राणी कहाचित करता हैं प्राप्त मनुष्य जन्म
इस भारत भूमि में।
देव-दुर्लभ यह मानव जन्म को
क्यों कर रहे हो व्यर्थ…..
घर में ही रह कर करो हरि स्मरण
और हरि नाम से प्राप्त होगा मोङ अव्यर्थ।(214)