(2) भारतीय जाति गठन में योगदान
किरात कछारी खाचि गारो मिरि
यवन कंक गोवाल।
असम मूलुक धोबा ये तुरुक
कुवाच म्लेच चंडाल।। (53)
आनो पापी नर कृष्ण सेवकर
संगत पवित्र हय।
भकति लभिया संसार तड़िया
बैकुंठे सुखे चलय।। (54)
(श्रीमद्भागवतः द्वितीय स्कन्ध)
कितारत कछारी खाचि गारो मिरि
यवन कंक ग्वाल,
असम मूलुक धोबी तुर्क
कुवाच मलेच्छ और चंडाल। (53)
अन्य पापी मनुष्य भी होते है पवित्र
कृष्ण – सेवक के संगत में,
प्राप्त करके भक्ति और छोड़ के माया संसार की
सुख से गमन करते बैकुंठधाम।। (54)
