एकादश अध्याय
(ॠ) अमृत मथन
(1) सम्र्पूण मानव फ्रानने का पद्धति अनुशीलन
कृष्णर चरणे हैवे यि मते भकति।
शुणा सावधाने ताक स्थिर करि मति।।
विष्णु भकतर संग लैबा प्रथमते।
गुरु मानि शुश्रषा करिबा भालमते।(375)
लैया उपदेश माधवक आराधिब।
यतेक सुकृति माने कृष्णते अर्पिब।।
कृष्ण कथा श्रवणत शुद्ध हैव मन।
सर्बदाये करिबेक कृष्णर कीर्तन।।(376)
कृष्णर चरण चिंतिहेक ह्मदयत।
आंछत ईश्वर हरि समस्त भूतत।।
हेन जानि प्राणीक करिफ्राा सतकार।
तेबेसे कृष्णत रति हेवक नोहृार।। (377) (कीर्तन घोषाः प्रह्लाद चरित)
जो है मार्ग, जगाने का कृष्ण भक्ति,
सुनो सर्बजन, होकर दृढ़ मति।
विष्णु भक्तों के संग रहकर प्रारम्भ में,
मार्ग दर्शक मान के करो शुश्रषा अच्छी तरह से। (375)
विष्णु भक्तों का उपदेश लेकर, करो आराधना कृष्ण की।
कृष्ण कथा श्रवण से शुद्ध होगा मन,
सदा करों कृष्ण का ही कीर्तन। (376)
करो कृष्ण चरण चिंतन ह्मदय में,
भगवन्त कृष्ण रहते है समस्त जीव में।
यह जानकर करो कल्यान सब प्राणीयो के प्रति,
तभी होगा तुम्हारा ईश्वर प्राप्ति। (377)
