(2) यथा कर्म तथा फलम्

हेन चिंति दिलन्त नन्दक समिधान। शुणा पितृ कहों येन शास्त्रर विधान।। कम्र्मेसे उपजै जीव कम्र्मेसे प्रलय। सुख दुःख भय शोक कम्र्मेसे मिलय।। (1005) (श्रीमद्भागवत, दशम स्कन्ध, आदि भाग) (कृष्ण ने) विचार करके नन्द को दिया समाधान। सुनो है पिता, कर्हू मैं शास्त्रों का विधान। अपने कर्म ही करते हैं निर्णय जीवों का उत्थान-पतन, सुख दुःख भय शोक हैं अपना कर्मो का ही परिणाम।(1005)

(3) भाग्य
ललाटे लिखित यिटी बिहित सवारे।
ताक कि आसिया इंन्द्रे गुचाइबाकपारे।।
कम्र्मेसे प्रवत्तै देखा यत चराचर।
कम्र्मर अधीन सवे देवासुर नर।। (1008) (श्रीमद्भागवत, दशम स्कन्ध, आदि भाग)

विधि विधान सब के लिए अनिवार्य है,
इन्द देव क्या इसे मिटा सकते है।
कम्र्म युक्त हो कर जो रहे है समस्त चराचर,
कम्र्माधीन ही है समस्त देव, असुर और नर। (1008)