(4) शरीर
मनुष्यादि चतुर्विध प्राणीर देहत।
जीवर सहित प्राण थाके अबिरत।
देहर आछय दोष व्यमिचार सिद्ध।
कतो बाल्य कतो युवा कतो होवे बृद्ध।। (195)
देहते थाकय प्राण नाहि व्यभिचार।
सेहिमते नाहि इटो आत्मार बिकार।।
(श्रीमद्भागवतः एकादश स्कन्ध, निमि नव सिद्ध संबाद)
मनुष्यादि चारों प्रकार प्राणी के शरीर में,
जीव के सहित प्राण निरंतर रहते है।
शरीर में रहता है समस्त गुण अवगुण,
फ्रााल, युवा और बृद्ध काल हैं इस के प्रमाण।(195)
किंतु देहवासी प्राण का नहीं होता गुण अवगुण,
ऐसे ही आत्मा की नहीं होता संसर्गज दुषण।

(5) मन

नाना कर्म करिबाक करे आलोचन।
एको कर्म स्थिर नोहे ताक बुलि मन।(63)
(श्रीमद्भागवतछ तृतीय स्कन्ध, अनादि पातन)

बहुत कार्य करने का करता है चिंतन।
किसी कार्य मे स्थिर नही, उस को कहते मन।। (63)