(6) बुद्धि
संकल्प बिकल्प कर्म करय निश्चय। बुद्धि नाम बुलि नाक जानिबा निर्णय।। (64) (श्रीमद्भागवतः तृतीय स्कन्ध, अनादि पातन) जब निश्चित रुप से बनती हैं कर्म योजना, उसी को कहते हैं बुद्धि, यह जान लेना। (64)
(7) अहंकार
समस्त कार्यक मञि करो बुलि माने। अहंकार बुलि ताक जानिफ्राा आपुने।। (64) (श्रीमद्भागवतः तृतीय स्कन्ध, अनादि पातन) सब कार्य में होता है अहम् का अभिमान, ऐसी भावना को कहते हैं अहंकार, यह जान।। (64)
(8) चित्त
नाना सद् कर्मक करय निते नित।
निश्चये जानिवा राजा तार नाम चित।।(65)
(श्री मद्भागवतछ तृतीय स्कन्ध, अनादि पातन)
सर्वदा करते है नाना प्रकार के सत्कर्म,
निश्चय ही जानो हे राजन, नाम उसी का है चित्त।। (65)
