ताक कि आसिया इन्द्रे गुचाइबाक पारे।।
कर्मेसे प्रवर्तै देखा जत चराचर।
कर्मर अधीन सबे देवासुर नर।।
इसी तरह महेन्द्र कन्दलि के पाठशाला में शिशा आरम्भ हुआ और वर्णमाला का ज्ञान पाप्त करतेही अ-स्वारान्त युक्त विरल (दुर्लभ) स्तुति गीति काव्य रचना किया श्रीशंकर ने –
करतल कमल कमल दल नयन।
भवदब दहन गहन बन शयन।।
नपर नपर पर सतरत समय।
सभय सभय भय ममहर सततय।।
खरतर फ्रारशर हतदश बहन।
खगचर नगधर फनधर शयन।।
जगदघ मपहर भर भय तरण।
परपद लय कर कमलज नयन।।
भकतर भयहर भगवन शरण।
शंकर कहरह नमरह मरण।।
उपरोक्त स्तुति गीत में श्रीशंकर नें अष्ट कलायुक्त नारायण, बारह कलायुक्त श्रीराम और सोल्लह कलायुक्त (पुर्ण कलायुक्त) परम व्रहृ श्रीकृष्ण के लीला महिमा प्रकाश किया। चौथा चरण को छोड़ के प्रति चरण में वर्ण का संख्या हैं पन्द्रह। यह स्तुति काव्य बयंजन वर्णमय और प्रत्येक वर्ण का अन्तस्वर है अ। यहा व्यवहार किया गया प्रत्येक शव्द है संस्कृत, परन्तु युक्ताक्षर विहीन, सरल, श्रुतिमधुर और छन्दमय। इस के अलावा भी शव्दचयन, बिन्नास-रीति, शबदालंकार प्रयोग आदि लक्षण समूह की उपस्थिति से कहा जा सकता हैं कि यह एक निश्चित रुप से ही दुर्लभ काव्य हैं और यह विन्दु में सिन्धु का प्रकाश हैं। प्राच्य और पाश्चात्य के सारे महापुरुषों या दुर्लभ व्यक्तित्वशाली पण्डित लोगों में भी फ्राारह साल उम्र में ही एसा सरल शब्दों से तत्वपूर्ण गीति-काव्य का रचना किया हुआ उदाहरण नही हैं। इसलिए विश्व का इतिहास में यह गीति-काव्य सर्वकाल का सर्वश्रेष्ट गीतिकाव्य या स्तुति गीत या भजन का रुप से विदित होगा और यह भारतवासी के लिए गौरव की विषय हैं।
होनहार बिरवान के होते चिकने पात – श्रीशंकर का यह दुर्लभ प्रतिभा के बारे में शिक्षागुरु महेन्द्र कन्दलि को ज्ञान हो गया और कन्ठ भूषन, राम सरस्वती आदि सब छात्रों में से श्रीशंकर को श्रेष्ठ घोषणा किया। एक दिन श्रीशंकर ने पाठशाला में अकेले शयन कर रहे थे। तब सर्प ने श्रीशंकर को छाया दिया हुआ मुहुर्त में अध्यापक महेन्द्र कन्दिल ने प्रत्यक्ष किया। बिरल अर्थात दुर्लभ काव्य रचना और सर्प ने श्रीशंकर को छाया प्रदान करना, यह दो परिघटनाओं के अनुभव से महेन्द्र कन्दलि जी को आश्यर्य हुआ। तब से ही अध्यापक महेन्द्र कन्दलि ने श्रीशंकर को देव रूप से विभूषित किया और समाज में श्रीशंकरदेव के नाम से सर्वजन विदित हुआ। उसके बाद श्रीशंकर देव जी ने किये हुवे रचनाए, उनके कर्म, दर्शन और उनके प्रतिष्ठित, प्रवर्तित और प्रचारित एक शरण हरिनाम धर्म तथा उनके द्वारा सृष्टि किया हुआ नई धारा की संस्कृति ने गुरु श्रीमन्त शंकरदेव जी की जगतगुरु श्रीमन्त शंकरदेव के रुप में प्रतिष्ठा किया। महेन्द्र कन्दलि के पाठशाला में चार वेद, चौदह शास्त्र, अठारह पुराण, चौदह व्याकरण, महाभारत, संहिता, अठारह तन्त्र, अठारह कोष व्याकरण अध्ययन करके पाठशाला का शिक्षा ग्रहण किया और छः वर्ष कालका शिक्षा समाप्त करके सतरह वर्ष उम्र में घर लौटे। पुर्वपुरुषों के नियमानुसार शंकरदेव जी ने शिरोमणि भुञा का दायित्व पालन करना पड़ा। वे अत्यन्त कुशलता से एक दक्ष प्रशासक के रुप में समाज में विदित हुवे और यह दक्षता के कारण उन्हे डेकागिरि के नाम से भी जाना गया।
